अमिताभ विजयवर्गीय

Indore Ka Maan: मैंने इंदौर को अपने साथ बड़ा होते हुए देखा है। मेरे बचपन का इंदौर बहुत खुला-खुला था। मैदानों की कमी नहीं थी। घरों के सामने, कालोनियों में जहां नजरें जातीं, वहां मैदान दिख जाया करते थे। उस दौर के बच्चों के कंधों पर बस्तों का बोझ नहीं था, हाथों में मोबाइल नहीं थे, आंखों पर चश्मा नहीं था। बच्चे तब मैदानों में इकट्ठा होते थे। नेहरू स्टेडियम में खिलाड़ियों की भीड़ लगा करती थी। एक उत्सव जैसा माहौल था। तब महाराजा यशवंतराव क्रिकेट क्लब (एमवायसीसी) का बड़ा नाम था। क्लब के शिविर नेहरू स्टेडियम और जिमखाना मैदान पर लगते थे। तब टेबल टेनिस का भी बहुत क्रेज था। विभिन्न् खेलों के खिलाड़ियों में अच्छी दोस्ती हुआ करती थी। पुरंदरे सर (इंदौर के प्रसिद्ध क्रिकेट प्रशिक्षक) मेरे पहले कोच रहे। तब संजय जगदाले सर एमवायसीसी में प्रशिक्षण देते थे। वर्ष 1980 में संजय सर ने सीसीआइ का गठन किया, तो मैं भी उनके क्लब में चला गया।

वे भी हमारे साथ ही खेलते थे। धीरे-धीरे ऐसा वक्त आया कि चार साल में मध्य प्रदेश की रणजी टीम में 6-7 खिलाड़ी सीसीआइ के होते थे। इनमें मेरे साथ नरेंद्र हिरवानी, अमय खुरासिया, देवआशीष निलोसे, सुनील लाहोरे, राजीव दुआ, अतुल प्रभाकर जैसे नाम शामिल थे। सभी ने 20-21 की उम्र में पदार्पण कर लिया था। लंबे समय तक हम रणजी टीम में नियमित रहे और क्रिकेट में खूब नाम कमाया। मैं खुद को किस्मत वाला मानता हूं कि मध्य प्रदेश की कप्तानी का अवसर मिला। करियर में संदीप पाटिल से बहुत सीखने को मिला। तब इंदौर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट इतना नहीं था और हम साइकिल से मैदान जाते। मैदानों में पत्थर-गिट्टी होती थी। फील्डिंग करते हुए चोट लग जाती थी।

जिमखाना में जब पहली बार विकेट बना तो हम बच्चों ने कुदाली से खोदाई की थी। कालोनियों में घूमकर बड़े पत्थर ढूंढते और ठेले से लाते ताकि विकेट का आधार बनाने के लिए बिछा सकें। अब खिलाड़ियों के पास बहुत सुविधाएं हैं। हमारे दौर में मैदानकर्मी नहीं होते थे। हम व सर पानी डालते थे, रोलर चलाते थे। (लेखक मप्र रणजी टीम के पूर्व कप्तान, मप्र रणजी चयन समिति के प्रमुख और बीसीसीआइ की दौरा व कार्यक्रम निर्धारण समिति के सदस्य हैं)

मेरे मन की याद गली

हम आर्ट्स एंड कामर्स कालेज परिसर में बने प्रोफेसर क्वार्टर में रहते थे। मैंने कैप्टन मुश्ताक अली को वहां बच्चों को प्रशिक्षण देते देखा है। वे स्टंप लेकर बल्लेबाजी करते थे और कहते- 'जो मुझे बीट करेगा, उसे एक रुपये का सिक्का दूंगा। मगर कोई भी उन्हें बीट नहीं कर पाता था। तभी मुझे लगा कि वे कितने महान बल्लेबाज हैं। उन्हें देखकर क्रिकेटर बनने का फैसला किया। मेरे बड़े भाई अनुराग भी मप्र अंडर-19 टीम में शामिल रहे। पिता आगरा विश्वविद्यालय से क्रिकेट खेलते थे।

Posted By:

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close