डा. सिद्धार्थ सोनी

Indore Ka Maan: बात इंदौर के मन की कहनी है, तो मुझ जैसा टेक्निकल आदमी भी जरा रूमानी हो चला है। अपने शहर की, अपनी माटी की, अपने कार्यक्षेत्र की बात करो तो मन में भावुकता आना स्वाभाविक है। न आए तो समझो, हम पत्थर हो गए हैं। लेकिन ये जो इंदौर है ना, इतना आनंद से भरा हुआ है कि यह पत्थर को भी पिघला दे। इंदौर को मेरी पीढ़ी ने बदलते हुए देखा है। हमें इंदौर हमेशा चैतन्य व जीवंत ही दिखाई दिया। यहां मिलों में धड़कती मशीनें हों या गली-मोहल्लों में पलता जीवन, यहां के लोग सदैव काम के आनंद में डूबे रहे। मुझे याद है वह दौर जब यहां डेली कालेज, मल्हार आश्रम, अहिल्या आश्रम व सेंट रेफियल्स जैसे स्कूल अगुआ होते थे। वहां से चलकर इस शहर ने एजुकेशन हब होने तक की यात्रा तय की है।

इंदौर ने 1977 के बाद से ही कंप्यूटर साइंस, आइटी, प्रोडक्शन इंजीनियरिंग, फार्मा सहित कई क्षेत्रों में शिक्षा देना शुरू कर दिया था। इसके पहले अर्थात 1965-66 के बाद से यहां का क्रिकेट बड़ा प्रसिद्ध हुआ। तबसे अब तक इंदौर ने हर क्षेत्र में प्रगति की है। यह सब यहां के लोगों की कठोर मेहनत और उन्नत सोच के कारण संभव हुआ।

(लेखक एसजीएसआइटीएस के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के पूर्व प्रोफेसर तथा भूकंप विशेषज्ञ हैं)

मेरे मन की याद गली

मध्य भारत में सबसे पहले वर्ष 1952 में इंदौर ने ही तकनीकी पढ़ाई का शुभारंभ किया था। श्री गोविंदराम सेकसरिया प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान ने तब रानी सराय में तकनीकी सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम की शुरुआत की थी। ट्रस्ट ने संस्थान का निर्माण किया था और सरकार से करीब 30 एकड़ की जमीन मिली। इंदौर का विराट मन देखिए कि कालेज को प्रसिद्ध व्यवसायी गोविन्दराम सेकसरिया ने 10 लाख रुपये दिए थे।

Posted By: Prashant Pandey

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