Indore Ka Man : संजय जगदाले, बीसीसीआइ के पूर्व सचिव : इंदौर यानी सपनों का शहर। इस शहर में ऐसा जादू है कि यह खुली आंखों से देखे गए सपनों को सच कर देता है। मैंने तो यहां खुद के और अपने लोगों के सपनों को सच होते हुए देखा भी है। इस जीवंत शहर में सदा रौनक बनी रहती है। शहरों के विकास में सरकारों का बड़ा योगदान होता है, लेकिन इंदौर को इंदौर बनाने में इंदौरियों की भी कठोर मेहनत है। यह स्वयंसिद्घा यानी सेल्फ मेड सिटी है। इंदौर में होलकर शासकों के दौर से अब तक शिक्षण संस्थाओं व अस्पतालों की सुव्यवस्थित उपस्थिति रही है। इसी तरह, क्रिकेट में भी इंदौर देश-विदेश तक धाक जमाता रहा है। होलकर टीम का नाम तो विदेश तक था। आज भी भारतीय क्रिकेट की चर्चा होलकर टीम के बिना अधूरी है।

इंदौर आरंभ से ही मध्य भारत की आर्थिक राजधानी रहा है। पहले यहां कपड़ा मिलें होती थीं, अब उद्योग, कारोबार व स्टार्टअप का बोलबाला है। दूर-दूर से लोग आजीविका की तलाश में इंदौर आए और यहीं के होकर रह गए। मेरी पीढ़ी ने इंदौर को तेजी से बदलते हुए देखा है। एक समय था जब यहां बहुत खुली और खाली जगह हुआ करती थी। तब इंदौर की शामें बहुत खास होती थीं। शब-ए-मालवा कहावत उन शामों के लिए ही बनी है। मुझे आज भी याद है, जब मैं छोटा था तब हम घर की छत पर सोते थे। उस ठंडी हवा में अनूठी ताजगी और सुकून था। अब इंदौर जरा बड़ा हो गया है। इसके माथे पर महानगर का मुकुट सज गया है। भव्य इमारतें खड़ी हो गई हैं, लेकिन पेड़ कट गए हैं। अब बचपन की वह ताजी हवा नहीं मिलती। मैं शाम को अक्सर जिमखाना मैदान पर बच्चों को प्रशिक्षण देने जाता हूं। वहां जरूर बहुत पेड़ व खुला मैदान है। वहां हवा की वही बचपन वाली ताजगी महसूस होती है।

इंदौर की हवा ही नहीं बदली, वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। हम गुलाम डंडा बहुत खेलते थे। आज के बच्चे इसका नाम तक न जानते होंगे। अब बच्चे मोबाइल में सिमट गए हैं। गलती उनकी भी नहीं। शहर में मैदान हैं भी कहां? इंदौर का विस्तार यहां के सार्वजनिक मैदानों को लील गया। जो पुराने मैदान हैं, वे ही खेलों को आश्रय दे रहे हैं। मगर ये भी उपेक्षित हैं। नेहरू स्टेडियम से मेरी बहुत यादें जुड़ी हैं। मैं यहां खेला हूं। कई ऐतिहासिक मैच यहां हुए, लेकिन अब इसकी दशा देख दुख होता है। प्रकाश हाकी क्लब जैसी पुरानी संस्थाएं खेलों को जीवित रख रही हैं। इन्हें मैदान की दरकार है। शासन मैदान का प्रबंधन भले अपने पास रखे, लेकिन खेल गतिविधियां सही हाथों में सौंपे। सफाई में इंदौरियों ने कमाल किया है। पहले जब किसी अच्छे शहर जाता था, तो सोचता था कि अपना इंदौर ऐसा क्यों नहीं! अब जाता हूं तो लगता है कि दूसरे शहर इंदौर जैसे क्यों नहीं। स्वच्छता के संस्कार ने इंदौर का मान बढ़ाया है। यही संस्कार ट्रैफिक में अपना लें तो हम देश में आदर्श शहर बन जाएंगे।

Posted By: Hemraj Yadav

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close