Indore Ka Man : अमय खुरासिया, पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खिलाड़ी। मेरा इंदौर...खट्टी-मीठी यादों का इंदौर...स्पंदन व संवेदना का इंदौर। सृजन व निर्माण का इंदौर, अन्नपूर्णा व मनपूर्णा का इंदौर, सबको सहज रूप से आंचल में आश्रय देने वाला इंदौर, कई दौरों से गुजरा फिर भी स्थितप्रज्ञ मेरा इंदौर। मेरे मन का इंदौर, प्यारा इंदौर, मां अहिल्या का आशीर्वाद मेरा इंदौर। पीछे मुड़कर जैसे ही यादों की पोटली टटोलता हूं तो आंखों के सामने बेहद शांत, सौंदर्य, आनंद व प्रकृति से भरपूर शहर नजर आता है। तब शहर के ज्यादातर मार्ग हरियाली के गहने ओढ़े मुस्कुराते रहते थे। नौलखा के नौ लाख पेड़ों का विनाश मेरे बचपन की आंखों ने देखा है। मैं और मेरा शहर उन पेड़ों के ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकता। चेतना, अनुभूति, भावना का कोई मोल नहीं दे सकता।

पहले शहर में एक ही बड़ा अस्पताल था और उसमें भी सबको जगह मिल जाती थी। आज शहर में कई अस्पताल हैं, फिर भी सब भरे हुए हैं। विकास का दायित्वबोध, विवेक के बिना केवल विनाश देता है। आधुनिक होने और प्रगतिशील होने में फर्क है। समझने की समझ का पाठ अव्वल आने वालों में मैंने कम ही देखा है। श्रेष्ठ और उत्तम में यही फर्क है।

मन से सदैव साफ-सुथरा रहा मेरा इंदौर अब तन से भी स्वस्थ है। सफाई में लगातार प्रथम आना इस शहर की संकल्पबद्घता और समर्पण को दर्शाता है। लगातार प्रयासरत रहना, परिश्रम करना इस बात को इंगित करता है कि यहां का मानस सदैव बेहतरी के हक में खड़े होने की कुव्वत रखता है। सफाई के संबंध में हमने गहन तिमिर से चलकर प्रस्फुटित होते प्रकाश तक का मार्ग तय किया है। अब हमें सफाई की परिधि से निकल स्वच्छता के केंद्र-बिंदु का मार्ग प्रशस्त करना है। परिस्थिति तो बदली, अब मन:स्थिति बदलने का उद्यम करें।

इंदौर का शिक्षक आकाश सदैव समर्पित सितारों से समृद्घ रहा है। शिक्षण संस्थाओं में श्री नंदलाल कौल, विमल जगदाले मेडम, पद्मनाभन मेडम, होमी दाजी और कई पुरोधा इस शहर में हुए हैं, वहीं खेल जगत में भी इस शहर की मिट्टी उर्वरा रही है। क्रिकेट को छोड़ दें, तो इस शहर में कई दूसरे खेलों के लिए मैदानों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता है। सर सेठ हुकमचंद की नगरी में धनाढ्य और दानवीरों से अपेक्षा है कि वे इस दिशा में पहल करें और इसकी प्रेरणा दक्षिण भारत से लें।

इस बात पर पुर्नविचार करने का वक्त आ गया है कि हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए कैसे इंदौर का सृजन करना चाहते हैं! एकांकी विकास कहीं चुनौती न बन जाए। आइये संकल्प लें और शहर को हरा-भरा बनाने के लिए स्वयं एक पौधा लगाएं। ठीक वैसे, जैसे हम सबके दादा-दादी, नाना-नानी और माता-पिता ने हमारे बेहतर भविष्य के लिए किया था। आइये, मानवीय गरिमा का आकाशदीप प्रज्ज्वलित करें।

Posted By: Hemraj Yadav

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