Indore Ka Mann : डा. दिव्या गुप्ता, इंदौर। इंदौर अब पहले जैसा नहीं रहा। शहर की चिंता करने वाले विलुप्त होते जा रहे हैं। नए लोग बाहर से आकर इंदौर की तासीर बदल रहे हैं। हर क्षेत्र में व्यावसायिकता हावी हो रही है। व्यावसायिक रूप से फलना-फूलना और विस्तार गलत नहीं, लेकिन व्यावसायिकता के लालच में यह शहर प्रकृति से दूर हो रहा है।

बिलावली और सिरपुर तालाब पिकनिक स्थल थे, लेकिन उनके मुहाने तक निर्माण हो चुके हैं। छोटी चिरैया और कौए गायब होते जा रहे हैं। मरीजों से भी पूछती हूं कि तितली देखी है? तो जवाब मिलता है, यह क्या होती है। हम अपनों के पास उठना-बैठना भूल गए। बच्चों को तरह-तरह की कक्षाओं में तो नया सीखने भेज रहे हैं, लेकिन नेचर वाक से दूर हैं। तकनीक और प्रकृति के साथ तालमेल बनाए रखना इंदौर की जरूरत है। दौड़िए, उड़ान भरिए ...लेकिन जड़ों की ओर लौटना ही होगा। पेड़ लगाने के बहाने हमने विदेशी मूल के पेड़ लगा लिए। जिस पेड़ पर चिड़िया अपना घोंसला नहीं बना सकती, वह किस काम का? रेडियो एक्टिव तरंगों ने मन के अंदर तक जगह बना ली है और वहां से प्रकृति के प्रेम को तिरोहित कर दिया है।

मैं अपने घर के पीछे के गार्डन में सुबह घूमने जाती हूं तो वहां कई महिलाएं मिल जाती हैं। उनसे राम-राम हो जाती है। एक-दूसरे का हाल-चाल पूछते हैं। सार्वजनिक उद्यान मेल-मिलाप और सामाजिकता कायम रखने का ताना-बाना बुनते हैं। मुझे लगता है, शासन की इच्छाशक्ति हो तो शहर में सार्वजनिक उद्यानों और बाग-बगीचों के लिए जगह भी निकल सकती है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मोड में सार्वजनिक पार्क विकसित किए जाएं तो सुचारू रूप से उनका रखरखाव किया जा सकता है। धनाढ्य लोगों को जोड़कर कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी में भी ऐसा किया जा सकता है। महिलाओं की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा है। मेरी टैग लाइन है- बेटियों को शिक्षित और बेटों को संस्कारित कीजिए।

मेरे मन की याद गली - 18 साल पहले एक महिला की डिलीवरी का केस बहुत जटिल हो गया था। बेटी का जन्म ठीक से हो गया, लेकिन मां की तबीयत बिगड़ गई। मुझे मां को किसी भी हालत में बचाना था। उस समय मां को 30 ब्लड ट्रांसफ्यूजन लगे थे। मैंने हर जान-पहचान वाले को पकड़ा और ब्लड का इंतजाम कराया। महिला के पति ने बहुत धीरज रखा। उन्होंने एक बार भी नहीं पूछा कि ऐसा क्यों हुआ। उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है, आप हैं तो मुझे कोई चिंता नहीं है। इस विश्वास के कारण ही मैं मां को बचा पाई। वह बच्ची 18 साल की है और ओडिशी नृत्यांगना है। कहीं उसका कार्यक्रम होता है, मैं देखने जाती हूं। उसका नामकरण भी मैंने ही किया- दिव्यांशी।

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं)

Posted By: Hemraj Yadav

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