Indore Ka Mann : प्रमोद डफरिया, इंदौर। बात 1973-74 की है। तब पूरे प्रदेश में कुल छह या सात इंजीनियरिंग कालेज ही थे। कालेज कम तो सीटें भी कम, फिर भी एडमिशन के लिए न तो पीईटी जैसी परीक्षा होती थी, न जेईई का झमेला। हायर सेकंडरी के मेधावी विद्यार्थियों को इंजीनियरिंग में सीधे प्रवेश दिया जाता था। इंदौर का एसजीआइटीएस तब भी प्रदेश का श्रेष्ठ इंजीनियरिंग कालेज माना जाता था। हायर सेकंडरी के प्रदर्शन के आधार पर मुझे भी इसमें प्रवेश का अवसर मिला।

मुझे याद है, 1978 में निकली हमारी बैच के 60 प्रतिशत विद्यार्थियों को इंदौर के माहौल ने नौकरी करने के बजाय उद्यम की ओर प्रवृत्त किया। आज उनमें से कई दिग्गज उद्यमी बन गए हैं और इंदौर में उद्योग जगत के बड़े नाम हैं। कुछ ने शिक्षण संस्थाओं की नींव रखी, तो कुछ ने अस्पताल शुरू कर इंदौर को सुविधासंपन्न बनाने में योगदान दिया। 1980 से 1982 के बीच मैंने भी अपनी फैक्ट्री ही शुरू की।

यह वह दौर था, जब सरकारी अनुमतियां तुरत-फुरत नहीं मिलती थीं। कहा जाता था कि यदि किसी से बदला लेना है तो उसकी फैक्ट्री खुलवा दो। न पर्याप्त संसाधन, न इंफ्रास्ट्रक्चर, न पर्याप्त बिजली और न ही ट्रांसपोर्टेशन की सुविधा। उस पर अनुमतियां हासिल करने के लिए कतार में खड़े रहना। फिर भी जैसे-तैसे टिनशेड में कुछ कारीगरों के साथ फैक्ट्री शुरू की। तब शहर शांत था। न होड़ नजर आती थी, न ही शान-शौकत दिखाने की झूठी स्पर्धा। पहला आर्डर महाराष्ट्र के सतारा से मिला। उस पहले आर्डर की खुशी आज भी है। तब मैं खुद गाड़ी का चेसिस चलाकर महाराष्ट्र से इंदौर लाया था। बाद में इंदौर तेजी से बदला। अब यहां हजारों उद्योगों में मशीनें धड़कती हैं।

वर्तमान दौर में इंदौर ने उद्योगों के लिए सुविधाएं व संसाधन तो जुटा लिए हैं, लेकिन सरकारी अनुमतियों का जाल अब भी उद्यमी की गति को धीमा कर देता है। दुबई की तर्ज पर हमें अनुमतियां और लाइसेंस तुरंत देने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। सरकारी विभागों के चक्कर लगाने की जरूरत ही न पड़े। एक ही जगह कुछ घंटों में सारी अनुमतियां मिल जाएं।

मेरे मन की याद गली - पहले इंदौर में खाने-पीने का शौक आज की तरह नहीं था। तब न 56 दुकान थी, न सराफा चौपाटी ऐसी विकसित थी। सराफा में कोने पर बस दो दुकानें थीं। जेब में पैसे आते, तो महीने में एक-दो बार कचौरी, समोसा या दहीबड़ा खाते। इसे ही तब पार्टी माना जाता था। पैसे कम होते थे और हम दोस्त ज्यादा, इसलिए हमने नियम बना लिया था। हर व्यंजन का नाम लिखकर पर्ची डाली जाती, जिसके हाथ जो पर्ची आती, उसे वह खिलाना होता। यूं सब मिलकर सभी व्यंजनों का आनंद ले लेते थे।

(लेखक एसोसिएशन आफ इंडस्ट्रीज मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हैं)

Posted By: Hemraj Yadav

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