Indore Ka Mann : हेमेंद्र सिंह जादौन इंदौर। हमारा इंदौर शहर बड़ा खूबसूरत है और उम्मीदों के पंख लगाकर मानो आकाश में उड़ रहा है। मोटामोटी बीते करीब 15 वर्षों में इंदौर ने इस उड़ान को और तेज किया है, और तय मानिए यदि यही गति, यही तेजी बनी रही तो अगले 20 वर्षों में इंदौर अपने नाम के आगे से मिनी मुंबई का तमगा हटाकर महानगर इंदौर के सम्मान से सुशोभित हो जाएगा। तब यहां देश-दुनिया से लोग अपने सपने सच करने आया करेंगे।

इंदौर वह शहर है, जहां के रहवासियों ने कठोर मेहनत से देश ही नहीं बल्कि विश्व में अपना एक नाम बनाया है। और बात केवल हमारी सफाई की कहानी की ही नहीं बल्कि शिक्षा, उद्यम, कारोबार, संस्कृति, साहित्य और कला के क्षेत्र की भी है। स्वच्छता क्रांति की चमत्कृत करने वाली अद्भुत कहानी को सुनने तो भारत के तमाम शहरों के अलावा अब यूरोप और अफ्रीकी महाद्वीप के देश भी आ रहे हैं। ़प्रिदेश की राजनीतिक राजधानी भले ही भोपाल है, लेकिन मध्य प्रदेश की असल राजधानी तो इंदौर ही है। सर्वाधिक आर्थिक समृद्घि यहां, सबसे अधिक फ्लाइट यहां, निवेश यहां, कारोबार यहां, उद्योग यहां, उत्पादन यहां, फैशन यहां, आधुनिकता यहां, संस्कार यहां, संस्कृति यहां...बल्कि कला के मामले में भी मप्र का गढ़ तो इंदौर ही है। तो इंदौर ही हुआ ना राजनीति को छोड़कर बाकी सब क्षेत्रों की राजधानी। यह सब इंदौरियों द्वारा की गई परिश्रम की पराकाष्ठा का प्रतिफल है। पर्यटन, विमानन, शिक्षा के क्षेत्र में इंदौर ने अभूतपूर्व उन्नति की है, और यह तरक्की लगातार जारी है।

मुझे कभी-कभी सुखद आश्चर्य होता है कि यह वही शहर है, जो कभी मिलों के बंद होने के कारण अवसाद में जाने को अभिशप्त था, किंतु यहां के लोगों ने जीवटता दिखाई और आज हम कई मामलों में देश-प्रदेश में सिरमौर हैं।यद्यपि अब इंदौर को अपनी आंखों में और बड़े सपने जगाने चाहिए। जो हम हासिल कर चुके, वह तो हमारा है ही, किंतु अब पंखों को और खोलें, और उंची उड़ान भरें, और विराट लक्ष्य तय करें। इंदौर की प्रतिस्पर्धा स्वयं इंदौर से है, इसलिए अपने सपने भी इंदौर को स्वयं ही तय करने होंगे। हम संकल्प लें कि देश-प्रदेश की तरक्की का ग्रोथ इंजन बनकर रहेंगे।

मेरे मन की याद गली - इंदौर में ही मेरा बचपन बीता इसलिए उस छुटपन की बहुत-सी मीठी यादें मेरे मन की याद गली में आज भी जीवंत हैं। मेरे पिता पुलिस अधिकारी रहे हैं। जब वह एरोड्रम थाने के प्रभारी थे, तब उनके साथ साथ बचपन में एयरपोर्ट जाने का अवसर मिलता था। वहां मेरी नन्हीं आंखों को विशालकाय विमान देखने को मिलते थे। उनकी लैंडिंग और टेकआफ देखने को मिलता था। मैं इतनी बड़ी मशीन को उड़ान भरते देख चकित रह जाता था। वह बालपन, वह चौंकना, वह आश्चर्य मुझे अब भी याद है।

(लेखक ट्रैवल एजेंट्स एसोसिएशन आफ इंडिया के मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष हैं)

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