Indore ke Shilpi: डा. रजनी भंडारी, इंदौर। थैलेसीमिया एक ऐसा रोग है, जिसके बारे में आज लोग काफी कुछ जानते हैं, लेकिन एक वक्त वह भी था, जब इसके बारे में जागरूकता का सर्वथा अभाव था। रोग क्या है, इसका उपचार कितना संभव है, यह तो दूर की बात थी, यहां तक कि लोग थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए रक्तदान करने से भी कतराते थे। उस दौर में थैलेसीमिया पीड़ितों की मदद के लिए इंदौर में कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू हुए, जिन्होंने कुछ ही वर्षों में इस रोग को लेकर शहर में जागरूकता की तस्वीर बदल दी। यह कार्य किया समाजसेवी और थैलेसीमिया एंड चाइल्ड वेलफेयर ग्रुप की संस्थापक डा. रजनी भंडारी ने।

डा. भंडारी ने पहले लायनेस क्लब की अध्यक्ष के रूप में समाजसेवा की शुरुआत की थी। उस दौरान कुछ थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों से उनकी मुलाकात हुई। उन्हें वह टीका लगना था, जिससे हेपेटाइटिस न हो। तब वह टीका करीब 350 रुपये में आता था और उन बच्चों के परिवार यह टीका लगवाने में सक्षम नहीं थे। तब डा. भंडारी ने क्लब सदस्यों के साथ मिलकर वह टीका लगवा दिया। वहां से यह सेवा बीज पड़ा। कुछ दिन बाद उन बच्चों ने उपचार संबंधित अन्य मांग की और तब लगा कि इस रोग से पीड़ित लोगों के लिए कुछ किया जाए। थैलेसीमिया पीड़ितों की मदद के लिए जनवरी 1996 से पृथक रूप से कार्य करना शुरू किया, जो आज तक जारी है।

शुरुआती दौर में सात पीड़ित बच्चों के उपचार के लिए डा. भंडारी अपने कुछ सदस्यों के साथ कार्य करती थीं। उपचार का खर्च भी आपसी सहयोग से जुटाने लगीं। बाद में जब पीड़ित बढ़ गए और राशि की कमी होने लगी तो लगा कि कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। तब पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया और उसमें विज्ञापन के माध्यम से होने वाली आय से रोगियों का उपचार होने लगा। हर रोगी के उपचार में समान राशि व्यय हो, यह जरूरी नहीं। इसलिए कई बार राशि आपसी सहयोग से भी एकत्रित की जाती है। चंद लोगों के सहयोग से शुरू हुए कार्य में वक्त के साथ मदद करने वाले हाथ बढ़ते गए।

आज के मेडिकल हब इंदौर में एक वक्त वह भी था, जब शहर के किसी शासकीय चिकित्सालय में थैलेसीमिया पीड़ितों के उपचार के लिए कोई पृथक वार्ड नहीं था। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से मांग की गई कि शहर के किसी भी एक चिकित्सालय में पृथक से थैलेसीमिया वार्ड हो। कोशिश रंग लाई और चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में संस्था को वार्ड उपलब्ध हुआ। 2002 में मिली इस सुविधा का परिणाम यह हुआ कि थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को ज्यादा बेहतर ढंग से उपचार की सुविधा मिलने लगी। पीड़ितों को उपचार के लिए यहां-वहां भटकने की परेशानी से निजात मिली। इस प्रयास के बाद अब शुरुआत हुई लोगों को रोग के प्रति जागरूक करने की और यह कार्य कार्यशालाओं के जरिए शुरू हुआ।

अब तक 52 महाविद्यालय में जागरूकता के लिए कार्यशाला आयोजित की जा चुकी है। चूंकि, थैलेसीमिया पीड़ित को बार-बार रक्त की आवश्यकता होती है इसलिए रक्तदान के प्रति लोगों को जागरूक करने की भी कोशिश की गई। पहले कई बार पीड़ितों को चार-पांच दिन तक रक्त मुहैया होने का इंतजार करना पड़ता था, पर अब यह परेशानी नहीं है। लोगों में यह जागरूकता भी फैलाई कि विवाह के पूर्व ही थैलेसीमिया की जांच हो जाए ताकि संतान इससे पीड़ित न हो।

Posted By: Hemraj Yadav

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close