इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर। Jashn-e-Rahat बुधवार रात अभय प्रशाल में 'निनाद" और 'अदबी कुनबा" की जानिब से हुए मुशायरे को इस लिहाज से कामयाब कहा जा सकता है कि रात 8 बजते-बजते परिसर के भीतर कोने-कोने तक सुनकारों ने पहुंच बना ली थी और रात पौने बारह बजे भी परिसर के बाहर बड़ी तादाद में मुशायरा सुनने के ख्वाहिशमंदों की लाइन लगी हुई थी। इसके चलते निजामत (संचालन) कर रहे डॉ. कुमार विश्वास को भी स्वीकार करना पड़ा कि उन्होंने अब तक अभय प्रशाल में जितने प्रोग्राम किए हैं, 'जश्न-ए-राहत" सब पर भारी रहा है।

मगर तस्वीर का दूसरा रुख ये भी है कि प्रशाल में जितनी जगह है, उससे ज्यादा पास बंटने की वजह से कई लोगों को एंट्री ही नहीं मिल पाई और सैकड़ों लोगों को गेट से ही बेरंग लौटा दिया गया। खास बात ये कि श्रोताओं को ऐसा हुजूम देख मंच संभाल रहे उद्घोषकों के सुर भी बदल गए। दूसरी दिक्कत ये रही कि शौरा की लिस्ट भी काफी लंबी खिंच गई।

जिसके चलते शुरुआती दौर के शायर वो रंग नहीं जमा पाए जिसके लिए इंदौरी मुशायरे जाने जाते हैं। इसके चलते रात 11.30 बजते-बजते सैकड़ों श्रोता बाहर आ गए थे। ये अलग बात है कि उनके लिए बाहर निकलने के लिए उतनी ही जद्दोजहद करनी पड़ी जितनी मशक्कत एंट्री के वक्त हुई थी।

फिर भी देश-दुनिया में इंदौर का नाम रोशन करने वाले शायर के सम्मान के लिए आयोजकों का शुक्रिया तो अदा किया ही जाना चाहिए। इस सम्मान के लिए उन्होंने न केवल सुमित्रा महाजन, सज्जन सिंह वर्मा, तुलसीराम सिलावट, जीतू पटवारी, रमेश मेंदोला जैसे नेताओं को बुलावा भेजा बल्कि जावेद अख्तर, सत्यनारायण सत्तन, स्वानंद किरकिरे, ताहिर फराज, अजहर इनायती समेत देश के कई नामवर कलमकारों को भी शामिल किया।

आज फिर आदम की बेटी हंटरों की जद में है

आयोजन को नया आयाम कुमार विश्वास ने हाल ही में हैदराबाद में दरिंदों की दरिंदगी का शिकार हुई प्रियंका का दर्द बयां करते हुए दिया। उन्होंने कहा कि जब हमारे देश की बच्चियां जिंदा जलाई जा रही हैं तब संसद पर बहस इस बात की हो रही है कि एसपीजी सुरक्षा किसको मिले और किसे नहीं? अपने एक प्रिय कवि की इन पंक्तियों के साथ उन्होंने आधी आबादी के हक में पूरी मजबूती से बात रखी। 'मौन ओढ़े हैं सभी दुश्वारियां होंगी जरूर, राख के नीचे दबी चिंगारियां होंगी जरूर, आज फिर आदम की बेटी हंटरों की जद में है, हर गिलहरी के बदन पर धारियां होंगी जरूर"।

'बंसी सब सुर त्यागे है, एक ही सुर में बाजे है"

अब बात शेर-ओ-शायरी की। मुशायरे के जिन शौकीनों ने शाम 6 बजे से लाइन में लगकर एंट्री ली थी उनके लिए आखिरकार करीब चार घंटे बाद रात 10 बजे वो लम्हा आ ही गया, जिसका उन्हें बेसब्री से इंतजार था। बतौर पहले शायर जुबेर अली ताबिश नमूदार हुए। उन्होंने कुछ अच्छे अशआर पढ़े जिनमें ज्यादातर टूटे दिल की बातें थीं। 'तेरे खत आज लतीफों की तरह लगते हैं, खूब हंसता हूं जब लफ्ज-ए-वफा आता है" और 'आज तो दिल के दर्द पर हंसकर, दर्द का दिल दुखा दिया मैंने" जैसे अशआर तालियां बटोरने में भी कामयाब रहे। लेकिन पुरजोर तालियां 'बंसी सब सुर त्यागे है, एक ही सुर में बाजे है, हाल न पूछो मोहन का, सब कुछ राधे-राधे है" के हिस्से में आईं। जिसे उन्होंने कुमार विश्वास की खास फरमाइश पर पढ़ा।

'आंसुओं से मैं बनाता हूं तेरी तस्वीर अब"

उनके बाद तशरीफफर्मा अबरार काशिफ ने भी निराश नहीं किया। हालांकि उनकी शायरी में संवेदनाओं से कहीं ज्यादा एहसास अहम का रहा। 'समंदरों को भी मालूम है हमारा मिजाज, कि हम तो पहला कदम ही भंवर में रखते हैं" जैसे शेर उनके मिजाज की निशांदेही कर गए। मगर इश्क-ओ-मुहब्बत के लिहाज से उनका ये शेर खासतौर पर काबिलेगौर रहा। 'आंसुओं से मैं बनाता हूं तेरी तस्वीर अब, मेरी आंखों को तेरा चेहरा जुबानी याद है" जैसे दाद बटोरते शेर के बाद उन्होंने एक नज्म 'मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई" भी पढ़ी लेकिन उस दौरान वो खासी हड़बड़ी में नजर आए। जिसके चलते नज्म के कई लफ्ज श्रोताओं को समझ ही नहीं आए।

कलंदर पड़ गया भारी सिकंदर की कमाई पर

मुश्ताक अहमद मुश्ताक यूं तो बेहद उम्दा शायरी के लिए जाने जाते हैं लेकिन बुधवार को उनका रंग नहीं चढ़ा। जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका से आए शायर सरफराज मुकादम को सुनने में श्रोताओं ने ही ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। सामने एक से बढ़कर एक नामवर शायर तशरीफफर्मा देख वो एक अनजान शायर को वक्त देने के लिए तैयार ही नहीं हुए। फिर भी उन्होंने 'कलंदर पड़ गया भारी सिकंदर की कमाई पर" और 'तुम्हारी आंख का आंसू हमारी आंख से निकले" जैसे कुछ मिसरे काफी अच्छे कहे। बुजुर्ग शायर नईम अख्तर खादमी ने कुछ आला दर्जे के शेर पढ़े लेकिन वो रंग नहीं जमा जिसके लिए वो जाने जाते हैं।

दूसरा हिस्सा ज्यादा पुरअसर रहा

दरअसल, मुशायरे की इस महफिल का इंतजार उम्दा शेर-ओ-शायरी के शौकीन और खासतौर पर राहत इंदौरी के मुरीद एक मुद्दत से कर रहे थे। आला दर्जे की शायरी के शौकीनों के शहर में यूं तो उम्दा कलामों और शेरों की महफिलें अक्सर सजती रहती हैं मगर इनमें से कुछ ही ऐसी होती हैं जो सामिईन की यादों की पोटली में हमेशा के लिए महफूज हो जाती हैं। बेशक 'जश्न-ए-राहत" का भी शुमार ऐसी महफिलों में होगा लेकिन ये भी मानना पड़ेगा कि अदब के लिहाज से बुधवार रात सजी महफिल का दूसरा हिस्सा पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा ज्यादा पुरअसर रहा। बहरहाल राहत साहब को दिली मुबारकबाद कि उनकी कलम 50 साल पूरे कर अब सुनहरी हो चली है। ... मुबारक मुकद्दस बादशाहत की, कलम 'सुनहरी" हो चली 'राहत" की।

Posted By: Hemant Upadhyay

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