इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। Indore News बढ़ती उम्र के कारण शरीर कमजोर हो चुका था, लेकिन निर्मला पाठक के हौसले बुलंद थे। उनकी कोशिश रहती थी कि शहर में कोई बड़ा आयोजन हो और वे कैसे भी उसमें शामिल हों। धीरे-धीरे लकड़ी के सहारे वे पहुंच जाती थीं। फिर अपने किस्से, पुरानी यादें लोगों को बताती थीं। शहरभर के रिक्शा वाले उन्हें जानते थे और 'मम्मी' कहकर पुकारते थे।

निर्मला उनसे लिफ्ट भी लेती थीं तो उनके साथ आगे की सीट पर ही बैठती थीं। अब निर्मला सड़कों-चौराहों पर नजर नहीं आएंगी। वर्षों तक शहर के यातायात को संभालने वालीं ट्रैफिक वार्डन निर्मला पाठक (96) ने लवकुश विहार स्थित मकान में शनिवार को अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बीमार थीं। नवंबर 2018 में गिरने के बाद से उनके दाएं पैर में लकवा हो चुका था। इससे उन्हें बिस्तर से उठाने में काफी तकलीफ होती थी। शनिवार को उनकी इच्छानुसार आंखें दान की गईं। परिवार के सदस्यों के मुताबिक वे दुनिया से जाने के बाद भी अपनी आंखों से शहर की यातायात व्यवस्था देखना चाहती थीं।

समाजसेविका पाठक ने करीब 50 साल तक शहर के अलग-अलग चौराहों पर यातायात व्यवस्था संभाली। उनके इस जज्बे को देखकर शहरवासी भी यातायात नियम का स्वतः पालन करने लगते थे। ज्यादातर समय उन्होंने गुजराती गर्ल्स कॉलेज व स्कूल के आसपास ट्रैफिक संभाला। पाठक पर उनकी उम्र कभी हावी नहीं हुई। खाकी वर्दी पहनकर और हाथ में छड़ी थामे इस बुजुर्ग ट्रैफिक वार्डन को कई आयोजन में भी देखा गया। पाठक के बेटे श्रीकांत का कहना है कि विधानसभा चुनाव के वक्त वे गिर पड़ी थीं। जैसे-तैसे लोगों ने उन्हें घर पहुंचाया। तबीयत बिगड़ती देख मैं अस्पताल ले गया। महीनेभर अलग-अलग अस्पतालों में इलाज चला। गिरने से उनके सीधे पैर ने काम करना बंद कर दिया। डॉक्टरों की सलाह पर उनकी देखरेख के लिए तुलसी दीदी को रखा। करीब 15 महीने वे बिस्तर से उठ नहीं पाईं।

फिल्मों में कर चुकीं काम

पाठक मूलतः मुंबई की रहने वाली थीं। उन्होंने कुछ फिल्मों में भी अभिनय किया। बाद में वे इंदौर आ गईं। यहां उन्होंने एक अलग पहचान बनाई। ट्रैफिक वार्डन के तौर पर उन्होंने वर्षों तक यातायात व्यवस्थित करने में भूमिका निभाई। यही वजह थी कि ट्रैफिक पुलिस का हर अधिकारी उन्हें पहचानता था।

कुछ कहना चाहती थीं

शनिवार को पाठक की तबीयत बिगड़ने पर आसपास के लोगों ने डॉक्टर को बुलाया था। एक रहवासी के मुताबिक कोई न कोई रोज उनसे मिलने जाता था। शनिवार को उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। वे आंखों से इशारे कर कुछ कहना चाहती थीं। उनकी हालत को देखते हुए डॉक्टर को बुलाया। उससे पहले वे इस दुनिया से चली गईं। इस बीच परिवार के सदस्यों को सूचना दी गई। मालवा मिल मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया। बेटे श्रीकांत ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान ट्रैफिक पुलिस के कुछ अधिकारी भी मौजूद थे।

Posted By: Nai Dunia News Network