dore News : लोकेश सोलंकी, इंदौर (नईदुनिया)। इंदौर के राऊ-रंगवासा में बन रहे खिलौना क्लस्टर में गड़बड़ी की परतें धीरे-धीरे उजागर होने लगी हैं। इंदौर को लेदर टाय यानी चमड़े के खिलौने के निर्माण के लिए जीआइ (ग्राफिकल इंटीकेटर) टैग मिला हुआ है यानी दुनिया में चमड़े के खिलौनों के निर्माण की शुरुआत इंदौर से ही हुई थी। बीस से ज्यादा उद्योग ऐसे हैं, जो वर्षों से इन खिलौनों का निर्माण कर रहे हैं और जीआइ टैगिंग की सरकारी सूची में रजिस्टर्ड भी हैं। अनोखी बात यह है कि खिलौना क्लस्टर में इनमें से एक को भी जगह नहीं दी गई।

रविवार को इंदौर में चमड़े के खिलौने का निर्माण कर रही इकाइयों के संचालकों की बैठक हुई। नेहरू नगर स्थित खिलौना कारखाना पर हुई बैठक में ऐसे तमाम उद्योग संचालक मौजूद थे, जो पीढ़ियों से इन खिलौनों का निर्माण कर रहे हैं। खिलौना निर्माताओं ने आरोप लगाया कि वर्षों से खिलौना उद्योग से जुड़े होने के बावजूद खिलौना क्लस्टर में उन्हें जमीन नहीं दी गई। आवंटन करना तो दूर, उलटे इस बारे में पूछताछ करने पर जिला उद्योग एवं व्यापार केंद्र और खिलौना क्लस्टर के लिए बनी एसपीवी (स्पेशल पर्पज व्हीकल) ने भी उन्हें लौटा दिया। खिलौना निर्माताओं के अनुसार, जबकि वर्षों से शासन और उद्योग विभाग को जमीन देने के लिए वे आवेदन देकर कतार में लगे हैं। लेदर टाय इंडस्ट्री एसोसिएशन को भी खिलौना क्लस्टर में शामिल नहीं किया गया।

जिम्मेदार नहीं दे रहे जवाब

रविवार को हुई बैठक में चमड़े के खिलौना निर्माण इकाइयां चला रहे लेदर टाय इंडस्ट्री एसोसिएशन के सदस्यों ने कहा कि खिलौना क्लस्टर के प्रस्ताव और आवंटन से पहले ही उन्होंने उद्योग विभाग में जमीन आवंटन के लिए आवेदन दाखिल कर रखा था। इकाई संचालक मनीष जाटव और नारायण रसीले के अनुसार, हमने खिलौना क्लस्टर की एसपीवी के कर्ताधर्ताओं से इस बारे में सवाल भी किया कि 15 दिन पहले बनी कंपनियों को जमीन दे दी गई, लेकिन उन्हें क्यों नहीं दी गई। क्लस्टर के कर्ताधर्ता रहे लोगों ने सीधा जवाब देने के बजाय हमें अगले चरण में शामिल करने का आश्वासन दिया। और तो और कन्फेक्शनरी की फैक्ट्री चलाने वालों को जगह दी गई, जबकि उनके लिए कन्फेक्शनरी क्लस्टर बना है और उनका खिलौना निर्माण से कोई ताल्लुक नहीं है। इकाई संचालकों के अनुसार जमीन आवंटन की निष्पक्ष जांच होगी तो सामने आ जाएगा कि प्लाट पाने वाले सभी लोग आपस में दोस्त या रिश्तेदार ही हैं।

चीन को पछाड़कर इंदौर को मिला था जीआइ टैग

2013 में इंदौर के लेदर टाय को जीआइ टैग हासिल हुआ था। खिलौना इकाई शरीफ आर्ट के शरीफ खान के अनुसार, असल में चीन ने चमड़े के खिलौना बनाने की शुरुआत का दावा किया था और जीआइ टैग मांगा था। उससे पहले ही इंदौर से चमड़े के खिलौने बड़े पैमाने पर पूरे यूरोप-अमेरिका में निर्यात हो रहे थे। दिल्ली से अधिकारियों की टीम 2007 में इंदौर पहुंची थी। उन्होंने ऐसे दस्तावेजी सबूत मांगे, जिससे साबित हो जाए कि इंदौर पहले से इन खिलौनों को बना रहा है। 1943 में देवास राजघराने की प्रदर्शनी में मेरे पिता पठान गफ्फार खान के बनाए चमड़े के खिलौनों को स्वर्ण पदक मिला था। 1946 में बांबे सरकार ने भी प्रदर्शनी का ऐसा प्रमाण पत्र जारी किया था। पिता के प्रमाण पत्र अधिकारियों को दिए गए। उन्होंने ये दस्तावेज आगे भेजे और चीन को पछाड़कर इंदौर ने जीआइ टैग हासिल कर लिया।

Posted By: Hemraj Yadav

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