Indore News: इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथारिटी आफ इंडिया (एफएसएसआइ) के मिठाई-नमकीन के पैकेट पर प्रस्तावित नए लेबलिंग नियमों का विरोध देशभर में शुरू हो गया है। मिठाई-नमकीन उद्योग ने अनुमान जताया है कि इन नियमों के लागू होने से देश में तेजी से बढ़ रहे मिठाई-नमकीन कारोबार को 7300 से 9600 करोड़ रुपये सालाना का नुकसान होगा। मिठाई-नमकीन कारोबारियों के अनुसार, देश का मिठाई-नमकीन उद्योग खुद ही तीन साल पहले शकर-नमक कम करने का अभियान शुरू कर चुका है। इसमें एफएसएसआइ भी साथ है। अब तो बिना सोचे समझे लागू की जा रही लेबलिंग प्रक्रिया में सुधार की मांग कर रहा है।

मप्र मिठाई नमकीन निर्माता एसोसिएशन के अनुसार, देश में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों का बाजार 10 प्रतिशत से भी कम है। विदेश में दैनिक आहार पैकेटबंद प्रारूप में आता है। वहीं हमारे देश में जिन्हें पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के रूप में गाइड लाइन के दायरे में लाया जा रहा है, वे नमकीन-मिठाई त्योहारों और खास मौकों पर खाई जाने वाली या थाली का एक छोटा सा हिस्सा है। ऐसे में विदेश के नियम-कायदे बिना सोचे-समझे भारतीय खाद्य पदार्थों पर लागू करना सही नहीं है।

पहले से चल रहा है काम - मिठाई-नमकीन एसोसिएशन के सचिव अनुराग बोथरा के अनुसार नमक, शकर और तेल की मात्रा कम करने की पहल तो खुद फेडरेशन आफ स्वीट्स एंड नमकीन मैन्युफैक्चर एसोसिएशन ही कर चुका है। 10 जनवरी 2019 को दिल्ली में राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर के प्रमुख 1000 मिठाई-नमकीन निर्माता उद्योग एफएसएसआइ के साथ मिलकर नमक-शकर का स्तर घटाने का संकल्प लेते हुए काम भी शुरू कर चुके हैं। देश में तेजी से लो सोडियम, शुगर फ्री और तमाम तरह के नए मिठाई-नमकीन भी लगातार उतारे गए हैं। उपभोक्ता खुद अपनी पसंद से विकल्प चुन रहा है।

दूध की मिठाइयां भी घेरे में - एफएसएनएम के अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार जैन के अनुसार, प्रस्तावित नए लेबलिंग नियमों में सिर्फ दो ही श्रेणियां रखी गई हैं, वो हैं ठोस और तरल। इससे हो यह रहा है कि फ्रूट जूस, लस्सी, रबड़ी जैसे उत्पाद भी कम रैकिंग वाले करार दिए जाकर हाई फैट और शुगर वाले घोषित हो जाएंगे। दूध की मिठाई के लिए भी अलग श्रेणी नहीं है जबकि आइसक्रीम को छूट मिल रही है। फेडरेशन ने अपनी ओर से यही मांग रखी है कि भारत में स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सर्वे किया जाए। खान-पान की आदतों और जरूरतों के अनुसार रैकिंग का पैमाना तय हो और उसके अनुसार लेबलिंग की जाए।

शकर-नमक प्रिजर्वेटिव भी - एफएसएनएम के डायरेक्टर फिरोज नकवी के अनुसार, भारतीय खाद्य पदार्थों में कई जगह शकर और नमक का उपयोग कुछ खास उद्देश्यों से किया जाता है। कई व्यंजनों में इन्हें प्रिजर्वेटिव के तौर पर तो कहीं प्रक्रिया में विशेष स्वाद के लिए। जैसे आचार नमक या दूध से बने गुलाब जामुन, रसगुल्लों में। रैंकिंग तय करने के प्रस्तावित नियमों में तो 100 ग्राम मात्रा को लेकर उसमें नमक-शकर मापकर हाईफैट या शकर-नमक वाला घोषित कर दिया जाएगा। जबकि न तो कोई व्यक्ति 100 ग्राम चार खाता है न ही गुलाब जामुन या रसगुल्ले की चाशनी खाई जाती है। हम यही मांग कर रहे हैं कि देश में विस्तृत सर्वे हो फिर रैंकिंग का पैमाना बने। विदेश से उठाए एक नियम से पूरे देश के विविधतापूर्ण खान-पान के लिए लेबल नहीं बनाया जाना चाहिए।

Posted By: Hemraj Yadav

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close