इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि,Indore News। लघुकथा लेखन आसान नहीं है, क्योंकि इसमें समुद्र को अंजलि में भरना पड़ता है। लघुकथा की सफलता लेखक के विचार, उसकी संवेदना, उसके चिंतन, मनन और शिल्प कौशल पर निर्भर करती है। भावों की प्रेषणीयता के लिए शब्दों की समर्थता तथा अभिव्यक्ति की कुशलता आवश्यक है। यह बात साहित्यकार डा. योगेंद्रनाथ शुक्ल ने लेखिका अचला गुप्ता के लघुकथा संग्रह 'अभिरुचि" के विमोचन अवसर पर कही। शहर में बीते दिनों इंटरनेट मीडिया के जरिए लघुकथा संग्रह अभिरुचि का विमोचन हुआ। इस अवसर पर डा. शुक्ल ने कहा कि कथा का उद्गम वेदों से माना जाता है लेकिन इसके नए रूप के लिए हम पाश्चात्य साहित्य के ऋणी हैं। भले ही लघुकथा, कहानी का वामन रूप है परंतु यह उससे भिन्न् है, क्योंकि यह कहानी की सिनोप्सिस नहीं होती। यह तीखे तेवर वाली विधा है। लघुकथा का केनवास छोटा होता है इसलिए सांकेतिकता व प्रतीकात्मकता का सहारा लिया जाता है।

कृति के संपादक मुकेश इंदौरी ने कहा कि लघुकथा गढ़ने के लिए माइक्रोस्कोपिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। स्थूल में सूक्ष्म की पहचान ही लघुकथा की नींव होती है। किसी परिस्थिति या घटना के किसी विलक्षण पल को शिल्प तथा कथ्य के सहारे उभार कर कथा का स्वरूप देना लघुकथा है। लेखिका अचला गुप्ता ने कहा कि संकलन में शामिल लघुकथाएं मनगगढ़ंत नहीं हैं। आसपास घटित होने वाली घटनाओं पर पैनी नजर रखते हुए लघुकथाओं को स्वरूप दिया है। लघुकथाओं में अनावश्यक विस्तार नहीं है। लेखन का शौक बचपन से रहा। ताउम्र अंतर्मन की भावनाएं कभी कविताओं तो कभी कथाओं के रूप में कागज पर उतरती रहीं। इस अवसर पर देश के कई जाने-माने साहित्यकार आनलाइन उपस्थित थे ।

Posted By: gajendra.nagar

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