Indore News : इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। गर्भ संस्कार विधि प्रशिक्षण शिविर तिलक नगर स्थित चंद्रप्रभु मांगलिक भवन में आयोजित किया गया। इसमें आचार्य प्रज्ञासागर महाराज ने कहा कि हमारे शास्त्रों के अनुसार गर्भ में आने वाले शिशु के उज्ज्वल भविष्य के लिए उसके आने के पहले महीने से लेकर नौवें महीने तक विधिवत विधि करने का विधान है। वर्तमान में यह संस्कार विधि लुप्त ही होती नजर आ रही है। कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि प्रांतों में आज भी यह विधि जीवित है। अत: यह विधि अति प्राचीन है जिसे पुनर्जीवित करने के लिए इस शिविर की कल्पना की है।

आचार्यश्री ने कहा कि हमारी समाज की कर्मठ महिलाएं आगे आकर प्रशिक्षण प्राप्त करके स्थानीय गर्भवती महिलाओं की गर्भ संस्कार विधि संपन्न कराने में सहयोग प्रदान करें। इसी आवश्यकता को देखते हुए यह शिविर का आयोजन किया गया है। तीसरे, पांचवें , सांतवें और नौवें महीने में यह संस्कार विधि की जाती है। इससे हम गर्भ से ही आने वाले शिशु को संस्कारवान बना सकते हैं। जिस तरह से अभिमन्यु को उसकी मां ने चक्रव्यूह को भेदने की कला गर्भ में ही सिखा दी थी। यदि हम गर्भावस्था के दौरान ज्यादा से ज्यादा समय मांगलिक कार्यों, पूजा पाठ, स्वाध्याय में समय व्यतीत करें तो हम अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकते हैं। आज समाज की महिलाएं प्रशिक्षित हो जाएंगी तो कभी भी गर्भवती महिला का संस्कार करने में कभी कोई दिक्कत नहीं जाएगी।

आज सभी रिश्ते समाप्त होते जा रहे हैं - आचार्यश्री ने कहा कि आज हम दो-हमारे दो की नीति नहीं बल्कि हम दो हमारा एक बच्चे की नीति अपनाई जा रही है। आज इसी नीति से परिवार के सारे रिश्ते खत्म होने के कगार पर हैं। भाई, बहन, मौसी, बुआ, चाचा आदि रिश्ते समाप्त होते जा रहे हैं। आज वर्तमान में अगर संस्कारित शिशु जन्म लेगा तो हम आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित कर सकेंगे। गर्भ संस्कार से भगवान की दृष्टि शिशु पर और शिशु की दृष्टि भगवान पर पड़ती है। जब शिशु गर्भ में ही मंत्रों का उच्चारण सुनेगा तो वो संस्कारित होकर जन्म लेगा। आज वर्तमान में गर्भ संस्कार विधि अति आवश्यक है जिसे हम सभी को अपनाना चाहिए।

Posted By: Hemraj Yadav

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close