Indore News : इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। आधुनिकता के दौर में हम एक अजीब परिस्थितियों में फंसते जा रहे हैं। इसका एक उदाहरण परिवार में सदस्य की तरह चुपके से शामिल हो गया मोबाइल है। हमें अहसास भी नहीं है कि किस तरह से जीवन को मोबाइल प्रभावित कर रहा है और हम अगली पीढ़ी को भी इसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग करने के लिए बिना कुछ बोले प्रेरित भी कर रहे हैं। माता-पिता बच्चों के सामने कभी भी मोबाइल हाथ में ले लेते हैं। खाना खाते हुए या गाड़ी चलाते हुए भी ऐसी गलती की जा रही है। यह सब बच्चा भी सीख रहा है। बच्चा जब भी रोने लगता है या खाना नहीं खाता है तो माता-पिता उसे मोबाइल दे देते हैं।

यह कहना है सोशल इंटेलिजेंस विशेषज्ञ संदीप आत्रे का। गुरुवार को फिक्की फ्लो द्वारा यशवंत क्लब में पैरेंटिंग विषय पर सेमिनार आयोजित किया गया। इसमें फिक्की फ्लो इंदौर की चेयरपर्सन पायल अग्रवाल सहित कई सदस्य मौजूद थे। आत्रे ने कहा कि पहले जब बच्चे गर्मी की छुटि्टयों में घर पर होते थे, तो परिवार के सदस्यों से खूब बातें होती थी। आसपास के बच्चों के साथ मिलकर क्रिकेट या कई खेल खेला करते थे, लेकिन अब जब बच्चा फ्री होता है तो मोबाइल में समय देता है। मोबाइल ऐसा दोस्त है, जिसके पास सबकुछ है, लेकिन दोस्त को जीवन में कितना शामिल किया जाए। इसके कोई स्टैंडर्ड तय नहीं है।

बच्चों की सप्लाई और डिमांड गड़बड़ा गई है - संदीप आत्रे ने कहा कि अब बच्चों को जिद करने की जरूरत नहीं होती। बिना मांगे ही माता-पिता साधन उपलब्ध करा देते हैं। एक समय बाद बच्चों को लगने लग जाता है कि दुनिया उसके लिए है। इससे बच्चों की सप्लाई और डिमांड की सोच में काफी अंतर हो जाता है। दुनिया से उसकी उम्मीद के स्टैंडर्ड भी अलग हो रहे हैं। संदीप ने कहा कि हम वस्तु विशेष के हिसाब से विकास करने लगे हैं। आजकल कारों के हिसाब से बिल्डिंग और घर तैयार होने लगे हैं, जबकि होना यह चाहिए कि इंसान के हिसाब से विकास होना चाहिए। हाल ही में मैं दुबई की एक मार्ग पर गया, वहां थोड़ा पैदल चला तो पता लगा कि दूर-दूर तक कोई भी व्यक्ति पैदल नहीं दिखा। सब कारों से आना जाना कर रहे थे।

Posted By: Hemraj Yadav

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