इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर। Indore News 'जश्न-ए-राहत" के दौरान राहत इंदौरी की जिंदगी के कई अनछुए पहलुओं की किस्सागोई करती किताब 'कलंदर" का इजरा भी हुआ। इसके बारे में लेखक हिदायत खान ने बताया कि किताब में राहत साहब से जुड़े कई संस्मरण इतने रोचक और भावपूर्ण हैं कि पलकें पुरनम हो जाती हैं। मसलन एक दफा मुशायरे से वापसी के दौरान वो अपने दोस्त शायर अल्ताफ जिया के साथ रेलवे स्टेशन पर खड़े थे।

तभी सामने से आती भिखारन को देखकर राहत साहब बेहद परेशान हो उठे। अल्ताफ ने वजह पूछी तो कहने लगे इन्हें देखकर मां की याद आ गई। फिर मुशायरे में शिरकत करने के एवज में उन्हें जो रुपयों का लिफाफा मिला था वो अल्ताफ को देते हुए बोले कि ये उसके हवाले कर दो। हैरान अल्ताफ ने कहा कि देख तो लो इसमें कितने रुपए हैं। मगर राहत नहीं माने। उन्होंने कहा कि मां के सदके में रुपए गिन के दिए तो क्या दिए? उन्हीं की कोशिशों से तो मेरे हिस्से पहला मुशायरा आया था।

रिक्शा वाले के हवाले हुई नई कमीज

ऐसे ही एक किस्से के बारे में हिदायत बताते हैं कि एक बार राहत साहब मशहूर शायर कैफ भोपाली के साथ सफर कर रहे थे। रेलवे स्टेशन से होटल जाने के लिए वो जिस हाथ रिक्शे पर बैठे उसके बदन पर कमीज नहीं थी। भरी गर्मी में वो पसीना-पसीना हो रहा था। कैफ भोपाली को उस पर तरस आ गया लेकिन उन्होंने उसे अपनी शर्ट देने के बजाय राहत साहब से कहा कि तुम अपनी शर्ट इसे दे दो।

हालांकि राहत, कैफ का बहुत लिहाज करते थे लेकिन सरे-रहगुजर इस तरह किसी को अपनी शर्ट देकर वो खुद का मजाक नहीं बनाना चाहते थे। इसलिए वो रास्ते भर खामोश रहे लेकिन होटल आते ही अपनी नई कमीज रिक्शा वाले के हवाले कर दी। किताब 'कलंदर" में राहत साहब की शायरी के सफर के साथ-साथ उनके परिवार वालों, दोस्तों और रिश्तेदारों से जुड़े भी दिलचस्प लम्हे साझा किए गए हैं।

Posted By: Hemant Upadhyay

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