Indore Ujjwal Shukla Column: उज्जवल शुक्ला, इंदौर, नईदुनिया। भाजपा की ओर से महापौर पद के प्रत्याशी पुष्यमित्र भार्गव का नारा है 'आपका मित्र...पुष्यमित्र।' शहर का 'मित्र' होने वाले इस पंच को उन्होंने वास्तविक जीवन में भी प्रदर्शित किया। दरअसल, हुआ यूं कि वे विधानसभा क्षेत्र क्रमांक एक के सुखदेव नगर में जनसंपर्क कर रहे थे। इस दौरान घर-घर जाने, लोगों से मिलने और मीठी अदा से मुस्कुराने में व्यस्त थे। तभी बादलों ने नेह बरसाया और उनके कपड़े भीग गए। हालांकि इसके बाद भी वर्षा जारी रही और जनसंपर्क भी। इसी दौरान एक कार्यकर्ता के घर भोजन का कार्यक्रम था। पुष्यमित्र पहुंचे, भोजन किया और उसी कार्यकर्ता से उसका एक शर्ट मांग लिया। गदगद कार्यकर्ता ने तुरंत एक शर्ट दिया। पुष्यमित्र ने उसे पहना और फिर जनसंपर्क पर निकल गए। इस सादगी ने साबित किया कि 'मित्र' शब्द केवल पुष्यमित्र के नारे में ही नहीं, बल्कि दिल में भी है।

बड़ी पार्टियों को लग रहा प्यादों का डर

नगरीय निकाय चुनाव के लिए दोनों प्रमुख दल, कांग्रेस और भाजपा ने गहन चिंतन-मनन और बैठकों के लंबे दौर के बाद अपने प्रत्याशी तय किए। हमेशा की तरह एक अनार और सौ बीमार वाली स्थिति बनी। जिन्हें टिकट नहीं मिला, वे मुंह फुलाकर बैठ गए। हालांकि वे घर नहीं बैठे, बल्कि चुनाव लड़ने के लिए अड़कर बैठ गए। बाद में इन्हें बैठाने के लिए उन नेताओं को मैदान पकड़ना पड़ा, जो अब तक चैन से बैठे थे। बागियों को पहले मनाया गया, फिर जिन्होंने नाम वापस नहीं लिया, उन्हें अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर डराया गया। इसके बावजूद हुआ कुछ नहीं। पार्टियों को डर है कि यदि सख्ती दिखा दी तो जो नाराज हैं, वे और ताकत के साथ नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में कार्रवाई को दोनों दलों द्वारा टाला जा रहा है। मोहलत की अवधि बढ़ाई जा रही है। बार-बार मौके दिए जा रहे हैं। इससे उन नेताओं की चिंता बढ़ गई है जो टिकट लेकर मैदान में घूम रहे हैं।

क्या दादा दयालु फिर साबित होंगे मैनेजमेंट गुरु!

दो नंबरी विधायक रमेश मेंदोला को उनके जानने वाले दादा दयालु कहते हैं। दयालु का नाम कभी मंत्री पद की दौड़ में, तो कभी निगम मंडल अध्यक्ष की दौड़ में चलता है, मगर हर बार वे केवल रेस में बने ही रह जाते हैं, रेस जीत नहीं पाते। इस बार महापौर के टिकट की रेस में भी उनका नाम सबसे पहले था, मगर महापौर टिकट की लाटरी तो अतिरिक्त महाधिवक्ता पुष्यमित्र भार्गव के नाम खुली। मेंदोला टिकट नहीं जुगाड़ पाए। मगर कहा जाता है कि उनके पास चुनाव जीतने का फार्मूला है। उन्हें चुनाव मैनेजमेंट में माहिर माना जाता है, इसलिए पार्टी की ओर से हर चुनाव में उन्हें प्रभार दे दिया जाता है। अब महाधिवक्ता को महापौर बनवाने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही दी गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दयालु के दम पर भाजपा जीत का पंच लगा पाएगी या नहीं।

महाकाल की भक्ति भक्तों को पड़ रही भारी

उज्जैन स्थित प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल के मंदिर में भक्तों की अपार आस्था है। किंतु इन दिनों यहां भक्तों को भक्ति बहुत भारी पड़ रही है। दरअसल, मंदिर का प्रबंधन जिला प्रशासन संभालता है और अधिकारी मंदिर को लेकर नित-नए प्रयोग करते रहते हैं। इससे भक्तों में नाराजगी है। जिला प्रशासन के प्रयोगों के चलते श्रद्धालुओं को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। एक तरफ राज्य सरकार लोगों को निश्शुल्क देशभर के तीर्थों के दर्शन करवा रही है, दूसरी तरफ महाकाल मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए मनमानी फीस वसूली जा रही है। बीते दिनों मंदिर में भस्म आरती व वीआइपी दर्शन के दौरान मिलने वाली 100, 201, 250 रुपये की रसीदों पर महाकाल की तस्वीर होने को लेकर भी बवाल मचा था। बताया जा रहा है कि इसे लेकर मंदिर के पुजारी व बजरंग दल ने इसका विरोध किया था।

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