Indore Ujjwal Shukla Column: उज्जवल शुक्ला, इंदौर, नईदुनिया। मध्य प्रदेश कांग्रेस में भले ही सब कुछ ठीकठाक दिखाई दे रहा हो पर वास्तव में ऐसा है नहीं। राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब के बाद अब उत्तराखंड में चुनाव से पहले कांग्रेस में कलह शुरू हो गई है। इसी तरह की कुछ हलचल मध्य प्रदेश में भी दिखाई दे रही है। खंडवा लोकसभा उपचुनाव से शुरू हुई कमल नाथ और अरुण यादव की कलह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। यादव के एक ट्वीट ने इस कलह को फिर सामने ला दिया है। यादव के इस ट्वीट को पार्टी के भीतर चल रही तनातनी से जोड़कर देखा जा रहा है। यादव ने ट्वीट किया है कि देश में उत्तर प्रदेश जैसी कांग्रेस की इकाई कहीं भी सक्रिय नजर नहीं आती है। राजनीतिक गलियारों में इस ट्वीट को सीधे-सीधे कमल नाथ की सक्रियता से जोड़कर देखा जा रहा है। यादव ने अप्रत्यक्ष तौर पर कमल नाथ की सक्रियता पर ही सवाल उठाए हैं।

आंसू बहाने की जल्दबाजी

प्रदेश का क्रिकेट संगठन सिर्फ क्रिकेटरों तक ही सीमित न होकर शहर के संभ्रांत लोगों का समूह है। वाट्सएप समूह में जन्मदिन की बधाई और निधन पर शोक व्यक्त करना भी एक परंपरा सी है। गत दिनों शोक व्यक्त करने की जल्दबाजी में जीवित व्यक्ति के नाम पर 'आंसू' बहा दिए गए। माहेश्वरी ट्रस्ट से जुड़े एक पदाधिकारी का निधन हो गया था। शहर में शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़े पुट्टपर्थी के सत्य साईं बाबा के अनुयायी एक बड़े उद्योगपति का भी यही नाम है। बिना तथ्य जांचे मप्र क्रिकेट संगठन के वाट्सएप समूह में जीवित व्यक्ति के फोटो के साथ निधन पर शोक व्यक्त करना शुरू हो गया। यहां संदेश देखकर लोगों ने उद्योगपति के घर फोन लगा दिए, लेकिन जब गलती का पता चला तो शर्मिंदा होने के साथ ही माफी भी मांगनी पड़ी।

कलम के सिपाहियों को सच्ची श्रद्धांजलि है 'बिछड़े कई बारी-बारी'

कोरोनाकाल में बहुत सी मौतें हुईं, या यूं कहें एक महामारी हमारे सामने से अपनों को छीनकर गुजरी और हमारे देखते-देखते बहुत सारे लोग भगवान को प्यारे हो गए। इनमें वो लोग सबसे ज्यादा थे जो ऐसे कठिन समय में भी अपनी चिंता किए बगैर जनकल्याण में लगे हुए थे। इनमें इंदौर के कई पत्रकार साथी भी थे। ग्वालियर के वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली ने कोरोनाकाल में अपनी जान गंवाने वाले पत्रकारों की मौत का संकलन करके उनको अमर करने का प्रयास एक किताब के जरिए किया है। अपनी किताब 'बिछड़े कई बारीबारी' में उन्होंने इन्हीं कलम के सिपाहियों को अमर कर दिया है। किताब में इंदौर जैसे महानगरों से लेकर उन छोटे-छोटे जिलों, कस्बों के पत्रकारों का संकलन किया गया है, जिन्होंने अपने कर्तव्य के आड़े कोरोना जैसी महामारी को भी नहीं आने दिया। सच कहा जाए तो यह किताब कलम सेवकों को सच्ची श्रद्धांजलि है।

सरकार से लेकर दावेदार तक असमंजस में

चुनाव कोई भी हो नेताओं के लिए किसी महापर्व से कम नहीं होते। पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण का पेच फंसने के बाद से अब इस महापर्व में पंचायती रायता फैल चुका है। हालत यह है कि अब इन चुनावों को लेकर सरकार से लेकर दावेदारों तक में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इन हालातों को लेकर सरकार व संगठन स्तर तक पर विचार मंथन का लगातार दौर चल रहा है। सबसे ज्यादा पसोपेश में वे दावेदार हैं जो किसी तरह की जुगाड़ लगाकर निर्विरोध निर्वाचन की तैयारी कर चुके हैं। कई इलाकों में तो बोली लगाकर भी सरपंच का फैसला हुआ है। कई नेता चुनाव प्रचार की शुरुआत भी कर चुके थे, बैनर-पोस्टर से लेकर लोगों से मेल- मुलाकातों का सिलसिला भी प्रारंभ कर चुके थे। इंटरनेट मीडिया पर ग्रुप भी बनवा लिए। ओबीसी के रायते ने ऐसा जोर मारा कि दोनों दलों के दावेदारों के अरमान ठंडे हो चले हैं।

Posted By: Prashant Pandey

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