इंदौर। आज जिस तरह इंदौर में आए दिन चित्रकला प्रदर्शनी, चित्रकला स्पर्धा, आर्ट कैंप, कला पर व्याख्यान और कलाकारों के सम्मान में समारोह आयोजित होते हैं वह हमारे शैक्षणिक काल में वर्ष में कुछ-एक बार मनाए जाने वाले उत्सव की तरह ही होते थे। यह बात 1960 के दशक की है। आज की देवलालीकर कला वीथिका किसी जमाने में चित्रकला मंदिर के नाम से जानी जाती थी और पढ़ते तो हम यहां थे लेकिन परीक्षा देने मुंबई के जेजे स्कूल आफ आर्ट में जाते थे। पर अब बात बिल्कुल उल्टी हो गई है। आज चित्रकला संस्थानों की लंबी फेहरिस्त विद्यार्थियों के सामने है और चित्रों की दुनिया में बाजार के रंग भी चढ़ने लगे हैं।

यह कहना है इंदौर के वरिष्ठ चित्रकार वसंत अगाशे का। 1960 के करीब चित्रकला की शिक्षा लेने वाले वसंत अगाशे के हाथ अब चित्र तो नहीं रच पाते लेकिन उन्होंने एक ऐसी चित्रकला शैली को स्थापित किया जो अभी तक इस शहर का कोई दूसरा कलाकार नहीं कर सका। अमूमन चित्रकारी में पहले आउटलाइन बनाई जाती है लेकिन इन्होंने कैनवास पर रंग ही इस तरह भरे कि आउटलाइन बनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी बल्कि कैनवास का छोड़ा गया भाग आउटलाइन की तरह उभरा और यह शैली इन्होंने मानवाकृतियों में भी अपनाई। रियलिस्टिक, फिगरेटिव, ह्यूमन फिगर और चेहरे को आधार बनाकर बहुलता से कार्य करने वाले वसंत अगाशे ने अपनी कल्पनाओं से देवआकृतियां गढ़ीं जो खूब प्रचलित भी हुई।

राशि एकत्र कर लगाते थे प्रदर्शनी - अगाशे बताते हैं कि जिस वक्त उनकी शिक्षा पूरी हुई तब यहां कला प्रदर्शनी बहुत ही कम लगती थी। देश-दुनिया में किस तरह की कलाकृतियां रची जा रही यह जानने के लिए हम कलाकार दिल्ली या मुंबई जाते थे। उस वक्त यहां फ्राइडे ग्रुप प्रदर्शनी लगाया करता था। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं, वसंत चिंचवड़कर, पांडू पारनेरकर, नरेंद्र नाथ, माटेजी ने स्पेक्ट्रम समूह बनाया और कलाकारों ने आपस में धनराशि एकत्रित कर प्रदर्शनी लगाई। पहली प्रदर्शनी में जो कलाकृतियां बिकी उसमें से कुछ राशि अलग निकाल अगली प्रदर्शनी लगाई और इस तरह शहर में कला प्रदर्शनी लगाने का सिलसिला शुरू किया जो एक दशक से भी ज्यादा समय तक चला।

अब बाजार के रंग चढ़ने लगे - उस वक्त अमूर्तन शैली में कार्य करने का चलन अधिक नहीं था। कलाकार अपनी शैली विकसित करने में विश्वास रखता था और ऐसे कार्य ज्यादा करता था जो वास्तविकता के समीप हों। रंग और कैनवास बाजार में मिलते तो थे बावजूद कलाकार खुद ही कई बार रंग, कैनवास बनाया करता था पर अब रंगों की दुनिय में भी बाजार के रंग चढ़ने लगे हैं।

Posted By: Hemraj Yadav

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