कुलदीप भावसार, इंदौर। तेज हवा के झोंके, खुलते-बंद होते दरवाजे कभी इस स्कूल के छात्रों की परेशानी की वजह थे, लेकिन अब छात्र इससे परेशान नहीं होते। उनकी जिद ने न सिर्फ हवा को बिजली में बदल दिया, बल्कि स्कूल की छत को शहर की पहली छत भी बना दिया, जहां पवन चक्की लगी है। पवन चक्की से तैयार हुई बिजली स्कूल के कमरों को रोशन कर रही है।

निपानिया स्थित यह स्कूल है प्रूडेंशियल किड्स हाई स्कूल। दो साल पहले तक यह महालक्ष्मी नगर में लगता था। निपानिया में शिफ्टिंग हुई और स्कूल खुले इलाके में आ गया। चारों तरफ खेत थे। हवा की गति शहरी इलाके के मुकाबले कहीं ज्यादा थी। तेज गति से बहती हवा के कारण क्लास रूम के फड़फड़ाते दरवाजे-खिड़कियां उनकी पढ़ाई में विघ्न डालते।

छात्रों ने तेज हवा को स्कूल के फायदे के लिए इस्तेमाल करने के बारे में सोचा। छात्र हेमराज राठौर, हरिओम पटेल सहित करीब 10 छात्रों ने एक टीम बनाई और साइंस टीचर विक्रमसिंह जादौन से मिले। उनसे कहा कि वे पवन चक्की बनाना चाहते हैं। पहली नजर में तो शिक्षक को भी छात्रों के इरादे पर विश्वास नहीं हुआ। योजना पर काम शुरू हुआ। विज्ञान की किताबें खंगाली।

रंग लाई 20 दिन की मेहनत

छात्रों ने बंद पड़ी स्कूल बस से अल्टरनेटर की मदद से बैटरी चार्ज करने की व्यवस्था की। पवन चक्की के पंखे बनाने के लिए प्लास्टिक के सैनिटरी पाइप की मदद ली गई। पाइप काटकर ऐसा रूप दिया गया कि पंखे हवा के साथ आसानी से घूम सकें। इसमें सफलता मिली तो छात्रों ने स्कूल की पुरानी लोहे की चद्दरों को इसी डिजाइन में कटवाकर लोहे के पंखे बनवाए। इसके बाद गियर और अल्टरनेटर लगाए। पुराने बेयरिंग का इस्तेमाल कर ऐसा इंतजाम किया कि पवन चक्की हवा की दिशा के मुताबिक चारों तरफ घूम सके। करीब 20 दिन की मशक्कत के बाद सपना पूरा हुआ।

तीन गुना हो सकती है क्षमता

बर्वे के मुताबिक पुराने और बेकार पड़े सामान से जो पवन चक्की तैयार की गई उसकी लागत महज साढ़े 13 हजार रुपए है, जबकि इसी क्षमता की नई पवन चक्की की कीमत डेढ़ लाख से ज्यादा है। पवन चक्की से अभी 100 वॉट बिजली रोजाना तैयार हो रही है। मामूली बदलाव कर इसकी क्षमता तीन गुना की जा सकती है।

दो सप्ताह चली टेस्टिंग

मेहनत पूरी होने के बाद टेस्टिंग बाकी थी। शुरुआती दिक्कतों के बाद करीब दो सप्ताह तक टेस्टिंग चलती रही। इस बीच पवन चक्की में कई बदलाव किए गए। छात्रों के उत्साह को देख शिक्षक भी इस प्रोजेक्ट में जुट गए। आखिरकार पवन चक्की तैयार हो गई। स्कूल की संचालक रश्मि बर्वे ने बताया कि पवन चक्की से दिन में बैटरी चार्ज होती है, जिससे रात में स्कूल परिसर रोशन होता है। संभवत: यह शहर की पहली इमारत है, जहां पवन चक्की लगी है।