International Dance Day Special: इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। कथक, भरतनाट्यम, मोहिनी अट्टम या ओडिसी ये ऐसे शास्त्रीय नृत्य हैं जिनकी जड़ें बेशक मध्यप्रदेश की भूमि में नहीं जमी लेकिन इनकी शाखाओं ने मालवा की कलाप्रेमी जनता को अपनी छांव जरूर दी। अन्य प्रांतों के इन शास्त्रीय नृत्यों को यहां के कलाकारों ने न केवल अपनाया बलि्क उसका ज्ञान औरों को भी देना शुरू किया।

मालवा के दिल से निकली सिखने-सिखाने की यह आवाज न केवल प्रदेश व देश के अन्य शहरों में रहने वाले नृत्य साधकों को रास आ रही है बलि्क विदेश में बसे कला रसिकों के पैरों को भी परंपरा के घुंघरूओं से सजा रही है। शहर में कई नृत्य गुरू इन शास्त्रीय नृत्यों का प्रशिक्षण दे रहे हैं इनमे से कुछ ऐसे गुरुओं से हम आपको मिलवा रहे हैं जिन्होंने या तो इसके बीज यहां बोए या इस विधा के जरिए अपनी और अपने शहर की एक अलग ही पहचान बनाई।

शहर में पहली बार कराया अरंगेत्रम

भरतनाट्ययम से शहर को मुखातिब कराने वाली गुरु श्रुति राजीव शर्मा हैं। 1999 से शहर में भरतनाट्यम सिखाना शुरू करने वाली इस गुरु ने इसे इस मुकाम पर पहुंचाया कि शहर में पहली बार अरंगेत्रम (दीक्षांत समारोह) भी हुआ। श्रुति बताती हैं कि जब उन्होंने यहां भरत नाट्यम सिखाना शुरू किया तब इसके बारे में जागरूकता नगण्य के बराबर थी। कार्यशालाएं वप्रस्तुतियों के जरिए जागरूकता के साथ रूझान बढ़ता गया और आज देश ही नहीं बलि्क जर्मनी, जापाना आदि‍ देशों के विद्यार्थी मुझसे इंटरनेट मीडिया के जरिए भरतनाट्यम सीख रहे हैं। खुशी इस बात की है कि शहरी क्षेत्र के ही नहीं बलि्क ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थी भी इसे इसी माध्यम से सीखने लगे हैं।

कोरोना काल में बढ़ी सीखने वालों की संख्या

मुझसे पहले से यहां कई गुरु कथक सिखाते रहे हैं। पर मैं खुशकि्समत हूं कि इस शास्त्रीय परंपरा को टेलीविजन के रियलिटी शो में लेजाकर जीत प्राप्त करने का मौका मेरी शिष्याओं को मिला। यह कहना है कथक गुरु डा रागिनी मक्खर का। 1997 से कथक की तालीम दे रही रागिनी बताती हैं कि अब तक वे करीब 6 हजार विद्यार्थियों को कथक सिखा चुकी हैं। भारत के अलावा अमेरिका, इटली, कैनेड़ा, बुल्गारिया, फ्रांस, पैरिस में न केवल वे प्रस्तुतियां दे चुकी हैं बलि्क वहां के कई विद्यार्थियों को यह कला सिखा रही हैं। कोरोना काल में इंटरनेट मीडिया ने इस कला को फैलाने में और भी मदद की और इस वक्त में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या बहुत बढ़ी। मैं नृत्य ही नहीं बलि्क नृत्य का संस्कार भी देना चाहती हूं।

हर शहर में हो इसकी पहचान

केरल का नृत्य मोहिनी अट्टम अब शहर में भी होने लगा है व इसे यहां लाने का श्रेय युवा कलाकार आशीष पिल्लई को जाता है। आशीष बताते हैं कि उन्होंने यह नृत्य अपनी दादी से सीखा। चूंकि मैं इंदौर में ही रहता हूं इसलिए मैंने इसे यहां सिखाना शुरू किया और कम ही सही कुछ विद्यार्थियों ने इसे अपनाया। इस नृत्य के लिए मुझे नाट्यद्रुम पुरस्कार मिला और यह मेरा सौभाग्य है कि शहर का मैं पहला कलाकार हूं जिसे यह पुरस्कार मिला। आज इंदौर ही नहीं बलि्क भिलाई, नागपुर, जयपुर, आगरा और बेंगलुरु के विद्यार्थी यह कला सीख रहे हैं। मैं चाहता हूं कि यह कला केरल तक ही सीमित नहीं रहे बलि्क हर शहर में जानी जाए।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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