इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि, Irregularity Indore News। पलासिया क्षेत्र में खेड़ापति हनुमान मंदिर की करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन अतिक्रमण से मुक्त कराई जाएगी। मंदिर की जमीन पर बने गणगौर स्वीट्स के कारखाने सहित यहां अवैध कब्जा कर बनाई गई झुग्गी-झोपड़ियां भी हटाई जाएंगी। पुजारी ने गणगौर स्वीट्स के मालिक को मंदिर की कुछ जमीन बेच दी और उसने कारखाना खड़ा कर लिया। कुछ मकान भी बन गए। अब अपर कलेक्टर पवन जैन ने मंदिर की जमीन से अतिक्रमण हटाने के आदेश जारी किए हैं। साथ ही तहसीलदार सुदीप मीणा द्वारा पुजारी को लाभ पहुंचाने के संदेहास्पद आदेश को भी निरस्त कर दिया है। इस बीच कलेक्टर मनीष सिंह ने तहसीलदार को जूनी इंदौर क्षेत्र से हटाकर भू-अभिलेख का काम सौंप दिया है।

दरअसल, पलासियाहाना में मंदिर की करीब साढ़े तीन एकड़ जमीन है। मंदिर के तत्कालीन पुजारी महंत रामकृष्णदास गुरु जगन्नााथदास को मंदिर की जमीन मात्र पूजा-अर्चना के लिए सौंपी गई थी, लेकिन उसने इस जमीन को बेचना शुरू कर दिया। पुजारी ने तथ्यों को छिपाकर मंदिर की जमीन का डायवर्शन भी करा लिया। तत्कालीन अधिकारियों ने पुजारी द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों का गंभीरता से अध्ययन किए बिना डायवर्शन कर दिया। इस जमीन में से कुछ हिस्सा गणगौर स्वीट्स के मालिक को लीज पर दे दिया गया। उन्होंने यहां मिठाई का कारखाना बना लिया और कुछ हिस्से में मकान भी बन गए हैं। कुछ जमीन अब भी खाली पड़ी है।

अतिक्रमण हटाने के आदेश पुजारी ने किया था विरोध

मंदिर की जमीन से अतिक्रमण हटाने के लिए करीब नौ साल पहले 2012 में तत्कालीन तहसीलदार ने आदेश किए थे, लेकिन पुजारी के परिवार के लोगों ने राजस्व मंडल में अपील कर दी। राजस्व मंडल ने 2017 में एसडीएम और तहसीलदार के आदेश को निरस्त करते हुए सुनवाई के लिए दोबारा तहसीलदार को भेजा। राजस्व मंडल के आदेश के आधार पर तहसीलदार मीणा ने मामले की सुनवाई करते हुए 10 अगस्त 2021 को पटवारी की रिपोर्ट को निरस्त करने संबंधी आदेश पारित कर दिए, जबकि पटवारी ने अपनी रिपोर्ट में मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण बताया था। तहसीलदार का यह आदेश शासन हित में न होने से अपर कलेक्टर जैन ने प्रकरण को स्व निगरानी में लेकर पुनरीक्षण किया। साथ ही पुजारी पक्ष के लोगों को नोटिस जारी किए। पुजारी रामकृष्णदास के निधन के कारण उनकी ओर से उपस्थित दूसरे पक्ष की अर्चना वैष्णव ने आपत्ति दर्ज कराई।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश बना आधार : मंदिर की संपत्ति देवता की, पुजारी सिर्फ किराएदार

अपर कलेक्टर ने सारे तथ्य और अभिलेखों के आधार पर यह पाया कि मंदिर की जमीन शासकीय जमीन होने से तहसीलदार को शासन हित में इसका निराकरण करना था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अपर कलेक्टर ने मामले की जांच में पाया कि राजस्व अभिलेखों में वर्ष 1987 में भी मंदिर की जमीन का स्वामी खेड़ापति को बताया गया था और इस पर जगन्नााथ और अन्य को काबिज बताया गया। इससे स्पष्ट होता है कि यह जमीन पूजा-अर्चना के लिए पुजारी को सौंपी गई थी।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 में दायर एक जनहित याचिका पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पारित किया था कि पुजारी एक किराएदार की तरह काम करता है। वह काश्तकार नहीं होता। जो भी पुजारी होगा, वह मंदिर का प्रबंधन करेगा, उसकी देखभाल करेगा। कानून में देवता की मान्यता विधिसम्मत है, इसलिए मंदिर की संपत्ति देवता के नाम रहेगी। अपर कलेक्टर ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को आधार बनाकर मंदिर की जमीन के डायवर्शन को अवैध मानते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही मंदिर की जमीन पर बने मिठाई के कारखाने, मकान, शेड को अतिक्रमण की श्रेणी में मानते हुए इन्हें हटाने के आदेश किए। साथ ही राजस्व अभिलेख में संशोधन करने के निर्देश भी दिए।

Posted By: gajendra.nagar

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