Indore Ka Man: इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। कहते हैं वृद्धों के लिए अतीत तो तरुणों के लिए भविष्य सुनहरा होता है, लेकिन वर्तमान से हर कोई असंतुष्ट रहता है। अब हमें अतीत का राग अलापने की बजाय आज के स्वच्छ, बहुमुखी रूप से विकसित इंदौर को देखकर सुखद एवं गौरवमयी अनुभूति होना चाहिए। यह कहना है अर्थशास्त्री श्रीपाल सकलेचा का।

अर्थशास्त्री श्रीपाल सकलेचा बताते हैं कि 45 साल पहले मैं इस शहर आया था, तबके इंदौर और आज के इंदौर में बड़ा फर्क आ गया है। अस्सी-नब्बे के दशक के बाद शहर का तेजी से विकास हुआ। अतिक्रमण, गड्डों और गंदगी से लोगों को राहत मिलने लगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के शहरी नवीनीकरण मिशन एवं मोदीजी के स्कार्फ सिटी प्रोजेक्ट ने विकास को तेज गति प्रदान की। बाण्ड, फीडर एवं स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बनी चौडी-चौडी सीमेंट की सड़कों के किनारों एवं डिवाइडरों पर विकसित हुई पेड़ों की हरित पंक्तियों को देखकर मन खुश हो जाता है।

पहले रेसकोर्स रोड़ को देखकर हमारा सीना चौड़ा हो जाता था, वहां अब सुपर कारिडोर, आदर्श रोड़, शांतिपथ, एसजीएसआईटीएस रोड़, रिंग रोड की स्वच्छता एवं हरियाली मन को मोह लेती है। उद्यान के नाम पर जहां केवल नेहरू पार्क था वहां अब मेघदूत उपवन, रिजनकपार्क, विश्रामबाग जैसे बड़े-बड़े उद्यान एवं कालोनियों में विकसित एक हजार बगीचे नई छटा बिखेर रहे हैं। शास्त्री ब्रिज जैसे लगभग 10 बड़े ओवर ब्रिज शहर के यातायात को सुगम बना रहे हैं तो शहर की पुरातत्वीय धरोहरें- छत्रियों, राजवाडा लालबाग, गोपाल मंदिर, दशहरा मैदान का जीर्णोद्धार एवं सौन्दर्यीकरण हमारे अतीत को संवारने का सराहनीय प्रयास सिद्ध हो रहा है।

आज लगभग दस विश्वविद्यालय एवं सौ से अधिक कालेज उच्च शिक्षा दे रहे हैं।आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान प्रबंध एवं तकनीकी शिक्षा को नया आयाम दे रहे हैं। चिकित्सा क्षेत्र में ले देकर एमवाय अस्पताल था तो अब टी चोइथराम, बाम्बे हास्पिटल, मेदांता, विशेष जैसे कई अस्पताल एवं नर्सिंग होम अपनी सेवाएं दे रहे हैं। विकास के इस उजियारे के साथ कुछ अंधियारे पहलू भी है। अव्यवस्थित यातायात, जाम एवं पार्किंग की समस्या का समाधान आज शहर की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

करोड़ों की लागत से बेशकीमती जमीन पर बनाए गये मल्टीलेवल पार्किंग फेल हो गए हैं क्योंकि शहर के लोगों को जमीन पर गाड़ी पार्क करने की आदत एवं सड़क पर सब्जी खरीदना अच्छा लगता है। हाकर्स जोन की योजना कागजों पर ही रह गयी है। इसके लिए हर एक वर्ग किलोमीटर में शासकीय खुली जगह ढूंढ कर ऐसे दुकानदारों जमीन पर व्यापार करने की जगह देना चाहिए।

मेरे मन की याद गली

मैं जब 1977 में गुजराती कालेज में आया या तो छत्रीपुरा से नसिया रोड़ जूनी इन्दौर की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुजरते हुए कालेज पहुंचता था। मन में यह कल्पना आती थी कि गंगवाल से सरवटे एक सीधी और चौड़ी सड़क बन जाए तो जवाहर मार्ग का विकल्प मिल सकता है। बातचीत में अपने साथियों के सामने यह विचार रखता तो वे इस असंभव लगने वाले बात को हंसी में टाल दिया करते। अब गंगवाल- सरवटे रोड की परिकल्पना हकीकत में बदल रही है। खान नदी का पुनर्जीवन, छत्रियों का जीर्णोद्धार, मराठी स्कूल का काम्पलेक्स में परिवर्तन आदि कार्य सपनों के साकार होने जैसे हैं।

-( लेखक आयकर, जएसटी पर कई पुस्तके लिख चुके हैं। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहनसिंह द्वारा उनकी लिखी आयकर पुस्तक के लिए सम्मानित किया गया था)

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