- शहर में प्रस्तुति देने आए ख्यात कथक गुरु अशोक महाराज से चर्चा

इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर

आज के इस दौर में कथक को जीवित रखना बहुत बड़ी बात है। अक्सर लोग पूछते हैं कि घराना क्या है मैं कहता हूं कि घराना एक संस्कार है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाता है। हर घराने का अपना महत्व है। चूंकि मैं बनारस घराने का हूं इसलिए इसकी पहचान के बारे में यह कहूंगा कि इसमें 99.9 प्रतिशत केवल नृत्य के बोल ही होते हैं। शुद्ध नटवरी को बोलों के अलावा इसमें तबला और पखावज का प्रयोग नहीं होता। यह जानकारी बनारस घराने के कथक गुरु अशोक महाराज ने कही। कथक उत्सव के लिए शहर आए अशोक महाराज का मानना है कि आज का युग इंस्टेंट का युग है। वह तो स्टोरेज तक का भी इंतजार नहीं कर सकता, ऐसे में कथक को बचाए रखना बड़ी और मुश्किल बात है।

वर्तमान में एक और नया घराना सुनने में आ रहा है। वह है बॉलीवुड का घराना पर इसका अस्तित्व कब तक रहेगा यह देखना होगा। कथक तो हजारों साल पहले भी था और आज भी है। कथक ही क्या अन्य शास्त्रीय नृत्य भी सदियों से यथावत हैं और इसकी वजह है इनकी नींव पक्की है। जिसकी नींव कच्ची होती है खतरा उसे होता है। आज का युवा एक दिन नृत्य सीखने आता है और दूसरे दिन प्रस्तुति की उम्मीद रखता है, यह कैसे संभव है। सिखाने वाले भी थोड़े दिन सीखते हैं और फिर खुद ही सिखाना शुरू कर देते हैं। ऐसी अपरिपक्वता से वे खुद का तो नुकसान करते ही हैं साथ ही नई पीढ़ी का भी नुकसान कर रहे हैं। इस पर बंदिश लगाना बहुत मुश्किल है। अभिभावक भी बच्चों को यदि नृत्य सीखने भेजते हैं तो बच्चों के घर आने पर वे उनसे वहां मिली शिक्षा के बारे में पूछें, घर पर भी रियाज कराएं। इसे पार्ट टाइम मानकर ही नहीं रहें।

हर घराने का लेना होगा ज्ञान

कथक एक ऐसा पेशा है जिसमें अकड़ नहीं चलती। मेरे शब्दकोश में तो अकड़ उसी में है जो मुर्दा है। जीवित तो लचीला होता है और यदि आप जीवित हैं तो अकड़ना क्यों, झुकना सीखें। मैं अपने गुरु या अपने ही पिता के पैर छूता हूं तो यह तो बड़ी बात नहीं हुई। बात तो तब है जब आप अन्य बड़ों के भी पैर छुएं उनसे ज्ञान प्राप्त करें। जिस एक घराने की शिक्षा ले रहे हैं केवल उसी से बात नहीं बनेगी। यदि आप कथक के क्षेत्र में आए हैं तो हर घराने का ज्ञान लेना होगा, उनका और वहां के गुरुओं का सम्मान करना होगा। तभी आप कुछ सीख पाएंगे।

बेच तो दिया पर सजा नहीं पाए

आज टीवी चैनल पर कोई भी ऐसा रियलिटी शो नहीं जो शास्त्रीय कला पर आधारित हो। हम अपनी कला को बेचने में तो कामयाब हुए पर उसे सजा नहीं पाए। इसमें दोष दूसरों का नहीं खुद का है। जब भी कोई शास्त्रीय संगीत या नृत्य को सीखने आता है तो हम कहते हैं यह बहुत मुश्किल है, लोहे के चने चबाने के समान है। यह तरीका गलत है। इससे तो वह पहले ही घबरा जाएगा। उसे सही ढंग से जानकारी देना चाहिए। आज मैं बैठकर कथक करता हूं जो कला सालों पहले खत्म हो गई है। बैठ कर कथक करना और दर्शकों को बांधे रखना बहुत मुश्किल है। इसे यदि बरकरार रख पाया हूं तो इसकी वजह है कि मैंने रियाज किया, सीखने से डरा नहीं, ग्रहण किया और जो नहीं आया उसे ईमानदारी से कहकर दुबारा सीखा। चोरी करके नहीं सीखा मैंने। यूट्यूब चोरी से सीखने में मदद कर रहा जिससे कलाकार बेसिक नहीं जान पाता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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