- तीन दिनी कथक उत्सव संपन्ना

इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर

कथक में बनारस घराने की पहचान यह है कि इसमें भावों पर बहुत काम हुआ है, जबकि लखनऊ घराने में नजाकत और जयपुर घराने में गजब के फुटवर्क का समावेश है। इन तीनों घरानों की अपनी खूबसूरती है और अपनी अलग पहचान जिसका मिला-जुला रूप शहर में तीन दिनों तक नजर आया। शहर में जारी कथक उत्सव का तीसरा दिन तो और भी अनोखे रंग लिए आया जहां इन तीनों ही घरानों की एकल, युगल, समूह प्रस्तुतियों के साथ कथक की एक ऐसी शैली को देखने व समझने का मौका मिला जिसे कथक प्रेमियों ने शायद ही पहले कभी शहर में देखा होगा। यह प्रस्तुति थी बैठकी कथक की जिसे बनारस घराने के कथक गुरु अशोक महाराज ने प्रस्तुत किया।

कथक केंद्र, लोक संस्कृति मंच और नादयोग गुरुकुल के साझे प्रयास से शहर के लाभ मंडपम्‌ में हुए इस तीन दिनी आयोजन की समापन बेला अपने दामन में कई शैलियों, विविधताओं और खूबियों को लिए हुए थी। जिसमें दिग्गज कलाकार अशोक महाराज ने खुद और किशन महाराज के शिष्यों ने चार चांद लगा दिए। कथक को खड़े होकर पूरा मंच कवर करते हुए प्रस्तुति देना अलग बात है और एक ही स्थान पर बैठकर एक ही वाक्य या एक ही शब्द के अलग-अलग भाव दिखाकर दर्शकों को बांधे रखना किसी चुनौती से कम नहीं और यह काम अशोक महाराज ने बखूबी कर दिखाया।

अपनी प्रस्तुति की शुरुआत 'नजरिया लाग रही किस ओर' में उन्होंने नायक, नायिका, राधा, कृष्ण, मित्र आदि की नजर किस तरह प्रतिक्रिया देती है, किस ओर देखती है यह बताया तो 'सौतन घर जाए बसे हो' पंक्ति पर सौतन और उसके घर जाकर बसने की बात उन्होंने कई अंदाज में बताई। सौतन को कभी तलवार और बसने की बात को म्यान में तलवार रखने की मुद्रा से बताया तो सौतन को इत्र और इत्र को कपड़ों पर लगाने की मुद्रा से बसने की बात बताई। इसी तरह 'वो आ गया मेरे सामने' को कभी बालक, कभी प्रेमी, कभी सर्प, कभी नायक आदि के आने पर आने वाले भावों से समझाया। मुख मुद्राओं के साथ हस्त संचालन की बारीकियां विद्यार्थियों को सीखने को भी मिली। कथक में रुचि और उसका ज्ञान रखने वालों ने तो इस प्रयास को सिर माथे पर बिठाया, लेकिन ग्लैमर के शौकीनों को जरूर रास नहीं आया।

आयोजन का आगाज यूं तो दिन में ही हो गया था जिसमें सुबह के सत्र में डॉ. रागिनी मक्खर के शिष्यों ने और आशा अग्रवाल ने शिष्यों के साथ प्रस्तुतियां दी। शाम के सत्र में दिल्ली से आए गिरिराज सिंह भाटी और तपन रॉय ने मेहमान कलाकारों के रूप में मंच पर अपनी आदम 'शांताकारम भुजगशयनम्‌' श्लोक के भावाभिव्यक्त करते हुए दर्ज कराई। दोनों ही कलाकारों ने पृथक-पृथक रूप से गणेश परण प्रस्तुत की, जिसका अपना स्थान था लेकिन तपन रॉय ने जिस खूबसूरती से द्रौपदी चीरहरण प्रसंग को पेश किया वह तारीफ के काबिल था। शकुनी, दुशासन, द्रौपदी और श्रीकृष्ण सभी के भावों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया।

गिरिराज सिंह भाटी ने शिव स्वरूप का वर्णन किया जिसमें वर्तमान में जयपुर घराने में शामिल होते रूबाब का अंश भी था तो कहीं-कहीं लोकशैली का अंश भी था। खासतौर पर पार्वती को दर्शाते वक्त। प्रस्तुतियों की कड़ी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी इसके बाद मुद्रा बेंद्रे की थी। शिव तांडव स्त्रोत से अपनी प्रस्तुति की शुरुआत एकल रूप में करने के बाद इनका साथ भावना शर्मा और आस्था रूपशांडिल्य ने भी दिया और भाव पक्ष के साथ ताल पक्ष की साधना का भी परिचय दिया। कभी तबले तो कभी पखावज के साथ घुंघरूओं की जुगलबंदी श्रोताओं की दाद लेने में कामयाब रही। लोक गीत कजरी में कथक और उसमे भाव पक्ष रखना अच्छा प्रयास साबित हुआ पर इन तमाम प्रस्तुतियों पर मुद्रा की एकल और अंतिम प्रस्तुति भारी पड़ी। गत भाव में प्रस्तुत इस प्रस्तुति में श्रीकृष्ण के बाल रूप और प्रभु की मूर्ति के बीच को भक्त की नजर से बहुत ही सौम्यता, करुणा और भक्ति पूर्ण रूप से पेश किया।

शुक्रवार को संपन्ना हुए इस दिन दिनी आयोजन का समापन गुरु जयकिशन महाराज के शिष्यों ने अपनी प्रस्तुतियों से किया। कवि अशोक चक्रधर की रचना 'चिड़िया तू जो मगन धरा गगन, गगन मगन' पर आधारित थी जो चिड़िया के निर्भिक जीवन को और उसके सपनों को पंख देने की बात करती है। आयोजन बेहद गरिमामय था, लेकिन तीनों ही दिन कलाकारों को साउंड सिस्टम से काफी परेशानी हुई खासतौर पर फुटवर्क के वक्त। यही नहीं कुछ दर्शक ऐसे भी थे जो शास्त्रीय नृत्य की गंभीरता को समझे बिना प्रस्तुतियों में ताली के साथ सीटी भी बजा रहे थे पर कलाकारों ने इन तमाम बुरे पक्ष को नजर अंदाज कर दिया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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