खरगोन। खरगोन जिले में बड़वाह से 5 किमी दूर स्थित ग्राम बागफल में उन्नत किसान गोवर्धन तिवारी का खेत लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। करीब 20 साल पूर्व सेवानिवृत्त कृषि अनुविभागीय अधिकारी पिता परशुराम तिवारी की प्रेरणा से अपनी सेंट्रल वेयर हाउस की नौकरी छोड़कर उन्होंने जैविक खेती करने का निर्णय लिया था। 24 एकड़ बंजर और अनुपजाऊ जमीन को अपनी मेहनत से उपजाऊ बनाकर जैविक खेती शुरू की थी। आज वे जैविक खेती के साथ-साथ मधुमक्खी पालन कर शहद से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। इसके अलावा वे गौ संवर्धन अभियान से भी जुड़े हुए हैं।

पिता की सीख काम आई

गोवर्धन तिवीरी ने बताया कि मधुमक्खी पालन की प्रेरणा उन्हें अपने पिताजी से मिली थी। जिसे उन्होंने करीब तीन साल पहले शुरू किया था। इनके पिताजी का मानना था कि प्राकृतिक चीजों की ओर लौटे बगैर खेती में सफलता नहीं मिलेगी।

ऐसे मिली सफलता

प्रगतिशील कृषक तिवारी ने बताया कि करीब तीन वर्ष पहले पंजाब के राजवीर सिंह कृषि अधिकारियों के साथ स्थानीय बडाली फॉर्म हाउस पर आए थे, तब उनसे मधुमक्खी पालन के बारे में जानकारी मिली थी। अगले दिन उन्होंने इनके खेत में परीक्षण भी किया था। इसके बाद इस विषय के प्रति जिज्ञासा बढ़ने पर कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना जाकर वहां तीन दिन का प्रशिक्षण लिया था। झालावाड़ के देवाभाई के सहयोग से मधुमक्खी पालन के 10 बक्सों से शुरुआत की गई थी।

इस प्रकार होती है पूरी प्रक्रिया

मधुमक्खी पालन विधि के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि एक बॉक्स में तीन चेंबर होते हैं जो क्रमश: ग्रुप चैंबर, सुपर चैंबर और हनी चैंबर कहलाते हैं। हनी चैंबर से शहद निकाला जाता है। रानी मधुमक्खी के लिए शहद बनाने का काम श्रमिक मधुमक्खियां करती हैं। इन मधुमक्खियों का पदक्रम होता है, उसके मुताबिक यह कार्य करती हैं। फूलों का रस चूसकर श्रमिक मधुमक्खियां साढ़े तीन किमी तक का सफर तय कर वापस बक्से में लौट सकती हैं। ऐसा फेरामोन नामक पदार्थ की गंध के कारण होता है। इस तरह ये अधिक से अधिक मात्रा में शहद का निर्माण करती हैं।

कैसे होता है शहद निर्माण

मधुमक्खियों का सीजन सितंबर से फरवरी के बीच रहता है। इन दिनों खेतों में खरीफ और रबी की फसलों के साथ अन्य पेड़ पौधों पर भी फूल खिले रहते हैं। मधुमक्खी यूं तो हर मौसम की फसलों से अपना भोजन बना लेती हैं, लेकिन किसान गोवर्धन के अनुसार यदि सूरजमुखी, सौंफ, मसालों वाली फसलें, नीम के पेड़ और जंगल आसपास हों तो ये आसानी से भोजन ग्रहण कर शहद बनाती हैं।

ऑफ सीजन में मार्च से अगस्त तक मधुमक्खियों को 6 माह तक पालना पड़ता है। इन्हें भोजन के रूप में ग्लूकोज, शहद का पानी या जैविक गुड़ की राब आदि भोजन के रूप में दी जाती है। इसके अलावा हर 15 दिन में सूरजमुखी की फसल को बदल- बदल कर लगाना पड़ता है। इससे मधुमक्खियों को पर्याप्त रस मिल जाता है। मधुमक्खियां परागण के जरिए कपास के उत्पादन व गुणवत्ता में भी अहम भूमिका निभाती है।

उत्पादन बढ़ाना ही है लक्ष्य

खरगोन जिले के एकमात्र मधुमक्खी पालक तिवारी का प्रमुख लक्ष्य मधुमक्खी के बॉक्स बढ़ाना है। जाहिर है बॉक्स की संख्या बढ़ने पर उत्पादन भी बढ़ेगा। फिलहाल 40 बक्सों में उत्पादन किया जा रहा है। पहला साल व्यवस्थाओं में बीत गया। गत वर्ष करीब 6-7 क्विंटल शहद का उत्पादन हुआ। जिसे विभिन्न स्थानीय थोक और फुटकर ग्राहकों को 400 से 500 रुपए प्रति किलो की दर से बेचा। इस वर्ष भी 7-8 क्विंटल उत्पादन होने का अनुमान है।

मधुमक्खी पालन के उज्ज्वल भविष्य की चर्चा कर गोवर्धन ने कहा कि क्षेत्र में नहरों के विकास से निकट भविष्य में इसमें विस्तार होगा। नहरों के कारण सिंचाई होगी जिससे फूलों की संख्या बढ़ेगी और इसकी खेती में प्रगति होगी। सरकार की ओर से मधुमक्खी पालन के इच्छुक किसानों को नियमानुसार सुविधाएं दी जाती है। खंडवा जिले में तो अनुदान मिलता है।

अन्य किसानों के लिए संदेश

श्री तिवारी ने किसानों को यही संदेश दिया कि रासायनिक चीजों के इस्तेमाल से हो रहे नुकसान को देखते हुए खेती में फिर से प्रकृति की ओर लौटना पड़ेगा। जैविक खेती कर सूक्ष्म जीव विज्ञान के महत्व को समझना होगा। मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाने में केंचुए मददगार होते है। इसलिए हमें केंचुआ पालन और मधुमक्खी पालन जैसे कार्य करने होंगे क्योंकि यही समय की मांग है।

Posted By: Saurabh Mishra