इंदौर (रामकृष्ण मुले)। प्रयागराज हो या नासिक, उज्जैन हो या हरिद्वार का कुंभ। पिछले 280 साल से ऐसा कोई कुंभ और सिंहस्थ नहीं हुआ, जिसमें संतों और भक्तों को दर्शन देने इंदौर के बड़ा गणपति स्थित प्राचीन हंसदास मठ से भगवान पद्मनाभ नहीं पहुंचे हों। हर कुंभ में शालीग्राम शिला से बनी भगवान की ढाई फीट की मूर्ति के दर्शन डाकोर इंदौर खालसा के शिविर में होते हैं। इसका संचालन इंदौर के हंसदास मठ द्वारा किया जाता है।

मठ के वर्तमान अधिष्ठाता महंत रामचरण दास बताते हैं कि स्वामी हंसदासजी ने डाकोर इंदौर खालसा की स्थापना 1740 में की थी। इंदौर खालसा रामानंदीय संप्रदाय दिगंबर अनी आखाड़ा का देश का सबसे बड़ा प्राचीन खालसा है। इसका प्रतिनिधित्व अहिल्या की नगरी इंदौर करती है। उस समय सात मुख्य शिविर लगते थे। इसमें इंदौर खालसा का स्थान दूसरा था। अब यह संख्या 350 से अधिक हो गई है। स्वामी हंसदास जी महाराज ने देशभर में अपनी जमात चलाई व पूरे भारत में भ्रमण किया। शालीग्राम शिला से बने भगवान पद्मनाभ जी उनकी झोली में रहते थे। कुंभ मेले में जमात का जहां-जहां डेरा पड़ता था, उनकी वहां स्थापना और पूजन होता था। उनका चेहरा शालीग्राम शिला और शरीर काष्ठ से निर्मित है।

90 से अधिक कुंभों में विराजे

हंसदास मठ के संचालक पं. पवन शर्मा बताते हैं कि चार स्थानों पर बारह साल में कुंभ का आयोजन होता है। यह स्थान हरिद्वार, नासिक, प्रयागराज और उज्जैन हैं। अब तक 90 से अधिक कुंभ हो चुके है जिसमें इंदौर खालसा का शिविर लगाया गया। इसमें भगवान को विराजित किया गया। उनके दर्शन के लिए स्वामी हंसदास जी ने देशभर में करीब 700 छोटे-बड़े मंदिर और आश्रम बनाए। वहां के करीब 4 हजार साधु-संत दर्शन के लिए आते हैं। साथ ही खालसा से जुड़े हजारों श्रद्धालु भी आते हैं।

बड़ा गणपति से रामचंद्र नगर तक होता संतों का पड़ाव

कुंभ के मौके पर उस समय संतों की मंडलियां बड़ा गणपति से रामचंद्र नगर तक अपना पड़ाव डालती थीं। उनकी देखरेख की व्यवस्था होलकर शासन, कपड़ा मार्केट, सराफा, अनाज व्यापारी करते थे। इसके प्रमाण आज भी पत्र के रूप में मठ सुरक्षित हैं। उनकी पेशवाई राजवाड़ा तक आती थी।

उज्जैन सिंहस्थ के समय 1980 में लगी थी आग

उज्जैन सिंहस्थ के समय 1980 में हंसदास मठ में आग लग गई थी। आग में पूरा मंदिर जल कर खाक हो गया। सिर्फ पंचमुखी हनुमान जी की मूर्ति बची। साथ ही उज्जैन सिंहस्थ में होने के कारण पद्मनाभ जी सुरक्षित रह गए। इसके बाद पुन: मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया।

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