कपीश दुबे, इंदौर। ऐसा कम ही होता है, जब किसी टीम की सफलता के बाद खिलाड़ी से ज्यादा कोच की चर्चा हो। मगर घरेलू क्रिकेट में चंद्रकांत पंडित ऐसा ही नाम बन चुके हैं। पंडित के प्रशिक्षण में सामान्य सी नजर आने वाली मध्य प्रदेश टीम ने मुंबई जैसी मजबूत टीम को हराकर पहली बार रणजी खिताब जीता है। अब तक पंडित के प्रशिक्षण में छह टीमें रणजी खिताब जीत चुकी हैं। इनमें विदर्भ की टीम भी शामिल है जो कभी घरेलू क्रिकेट की सबसे कमजोर टीमों में गिनी जाती थी।

मध्य प्रदेश क्रिकेट संगठन वर्षों से रणजी का रण जीतने के लिए प्रयास कर रहा था, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी। मप्र टीम वर्ष 201516 के बाद से कभी रणजी ट्राफी के क्वार्टर फाइनल तक नहीं पहुंची थी। इसके बाद मप्र क्रिकेट के जिम्मेदारों को पंडित की याद आई, जो पहले टीम के कप्तान रह चुके थे।

महंगी कीमत पर पंडित को कोच बनाया गया। क्रिकेट समिति ने पंडित के चयन पर ही सवाल खड़े कर दिए थे। मामला कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन एमपीसीए पंडित के साथ खड़ा रहा। आखिरकार क्रिकेट समिति को ही बर्खास्त कर दिया गया।

इसके बाद पंडित पर चयन समिति की जानकारी के बिना खिलाड़ियों का चयन करने और शिविर में बुलाने पर विवाद हुआ। तब भी प्रबंधन कोच के साथ खड़ा दिखा। ऐसे में पंडित निश्चिंत भाव से अपना काम करते गए। मप्र में कोई सितारा खिलाड़ी नहीं था और इससे पहले विदर्भ में भी यही हालात थे, जब टीम चैंपियन बनी थी। पंडित ने टीम में 'सितारा" सिस्टम खत्म करने पर जोर दिया।

तब हार कर रोए, अब खुशी के आंसू बहे

मप्र टीम 24 साल बाद फाइनल में पहुंची थी। पिछली बार पंडित टीम के कप्तान थे, जबकि इस बार कोच। तब भी फाइनल बेंगलुरू के चिन्नाास्वामी स्टेडियम में हुआ था और इस बार भी यही मैदान था। तब हार के बाद पंडित रो दिये थे, जबकि इस बार जीत के बाद उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे।

इनका कहना है

हम इस दिन की दो साल से तैयारी कर रहे थे। मुझे मप्र क्रिकेट संगठन से पूरा समर्थन मिला। कभी भी पदाधिकारियों ने किसी मामले में हस्तक्षेप नहीं किया। हम जो प्रस्ताव देते थे, उसे स्वीकार किया जाता था। चयन समिति ने भी मेरा समर्थन किया। पसंद के खिलाड़ी चुने गए। इस कारण हम पूरा ध्यान खेल पर रख सके।

चंद्रकांत पंडित, कोच, मप्र क्रिकेट संगठन

मप्र टीम में प्रतिभा की नहीं, आत्मविश्वास की कमी थी। चंदू भाई ने खिलाड़ियों को खुद पर भरोसा करना सिखाया। अब हमारे खिलाड़ी मैदान में होते हैं तो चैंपियन की तरह होते हैं। विपक्षी टीमों को दबाव में लाते हैं। यह बदलाव टीम में आया है। इस जीत के साथ मप्र के हर आयु वर्ग के खिलाड़ियों में यह भरोसा जागा है कि हम जीत सकते हैं।

संजीव राव, सचिव, मप्र क्रिकेट संगठन

पंडित के प्रशिक्षण में रणजी चैंपियन बनी टीमें

सत्र टीम कप्तान

200203 मुंबई पारस म्हाम्ब्रे

200304 मुंबई साईराज बहुतुले

201516 मुंबई आदित्य तारे

201718 विदर्भ फैज फजल

201819 विदर्भ फैज फजल

202122 मध्य प्रदेश आदित्य श्रीवास्तव

ऐसे एक सामान्य टीम चैंपियन बन गई

प्रबंधन का समर्थन: पंडित को एमपीसीए ने पूरा समर्थन दिया। ऐसा समर्थन अन्य किसी प्रशिक्षक को नहीं मिला। उन्हें फैसले लेने की पूरी आजादी दी गई। इसमें टीम चयन से लेकर प्रशिक्षण की योजना शामिल है। पंडित को जो खिलाड़ी पसंद आता, उसे मौका देते। खिलाड़ी से उन्हें क्या अपेक्षाएं हैं, यह बताते हैं। खिलाड़ी को भरोसा दिलाया कि असफल होने पर चयन समिति भी उसे बाहर नहीं कर सकेगी।

चयन में पारदर्शिता: पंडित ने टीम चयन की व्यवस्था ही बदल दी। वे चयन समिति की बैठक में शामिल होते हैं। अब तक खिलाड़ियों के आंकड़ों के आधार पर चयन होता था। मगर पंडित अपनी भविष्य की योजना तैयार करते हैं। उसके हिसाब से प्रतिभाशाली खिलाड़ी को चुनते हैं। जब वे कोच बने तो मप्र के कई बड़े नामों को या तो बाहर कर दिया गया, या उन्होंने स्वयं संन्यास ले लिया।

बेंच स्ट्रेंथ: पंडित ने टीम में विकल्प तैयार किए। हर क्रम के लिए मप्र के पास वैकल्पिक खिलाड़ियों की कतार मौजूद है। रणजी के नाकआउट दौर में भी मप्र के पास पांच प्रमुख खिलाड़ी नहीं थे। इसके बावजूद टीम को फर्क नहीं पड़ा। इससे पहले ऐसी बैंच स्ट्रेंथ तैयार करने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

सख्त अनुशासन: टीम में पंडित ने सख्त अनुशासन का माहौल बनाया। स्टेडियम में प्रवेश करते ही खिलाड़ियों से उनके मोबाइल रखवा लिए जाते हैं और अभ्यास से लौटते समय ही वापस मिलते हैं। इससे खिलाड़ियों का पूरा ध्यान सिर्फ खेल पर होता है। यह संदेह भी खत्म हो जाता है कि अभ्यास का वीडियो या तस्वीर बाहर नहीं जाएगी।

टीम एकता: पंडित ने टीम को इकाई की तरह तैयार किया। पूरी टीम अभ्यास के दौरान एक से कपड़े पहनती है। एक ने लोअरटीशर्ट पहना है तो बाकी भी वैसे ही पहनेंगे। सभी मैदान में एक कतार में प्रवेश करते हैं। मैच से पहले पूरी टीम साथ में ध्यान करती है।

खुद भी करते हैं पूरी तैयारी: बतौर कोच पंडित खुद भी उतनी ही मेहनत करते हैं, जितनी खिलाड़ियों से करवाते हैं। विपक्षी टीम का पूरा वीडियो, पिछले प्रदर्शन की जानकारी लेकर अपनी रणनीति बनाते हैं। इसके बाद खिलाड़ियों को मैच की योजना और उनकी जिम्मेदारी समझाई जाती है। आमतौर पर रणनीति सत्र दर सत्र के हिसाब से होती है। पंडित विपक्षी टीमों के खिलाफ फील्डिंग जमाने में माहिर माने जाते हैं। जब गेंदबाज काम नहीं आते तो फील्डर सफलता दिला देते हैं।

लक्ष्य पूरा होने तक जश्न नहीं : मप्र टीम लगातार जीत रही थी, लेकिन कभी भी जश्न की कोई तस्वीर या बयान सामने नहीं आया। एक मैच खत्म होते ही पंडित तुरंत दूसरे मैच की तैयारी शुरू कर देते हैं। पंजाब के खिलाफ जब टीम क्वार्टर फाइनल जीती तो कुछ देर बाद उसी पिच पर वे फिर खिलाड़ियों को लेकर अभ्यास करने पहुंच गए थे।

विवादों पर प्रतिक्रिया नहीं: पंडित की सख्त अनुशासन की शैली के कारण कई बार विवाद भी हुए। मगर वे कभी भी मीडिया में बयान नहीं देते। खिलाड़ियों को भी मीडिया से दूर रहने की सख्त हिदायत दी। पूरा ध्यान सिर्फ अभ्यास और प्रदर्शन पर रखा।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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