इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। शिव-पार्वती का स्वरूप माने जाने वाले शिवलिंगी बीजों से एक कलाकार ने शिव परिवार की मूर्तियों को आकार दिया है। उनकी खोजी प्रवृत्ति और आस्था ने उन्हें शहडोल से अमरकंटक तक पहुंचा दिया। 22 लाख 51 हजार बीज इकट्ठा कर उन्होंने ये मूर्तियां 13 साल में बनाईं। इन्हें बनाने में किसी भी प्रकार का केमिकल प्रयोग नहीं किया गया। मधुमक्खी के छत्ते से बनाए गए मोम का प्रयोग बीजों को चिपकाने में किया गया है। बंगाली कॉलोनी स्थित सिद्धेश्वर शनिदेव नवग्रह मंदिर में इन मूर्तियों को रखा गया है।

शहडोल निवासी जगजीतसिंह छाबड़ा ने 1990 से शिवलिंगी के बीज एकत्र करना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने अर्धनारीश्वर, गणेश भगवान, कार्तिकेय, त्रिशूल व नंदी की मूर्ति को आकार दिया। इन्हें आकार देने में 1.51 लाख बीजों का प्रयोग किया गया है और बनाने में आठ साल लगे। इसके बाद 21 लाख बीजों से पांच साल में भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा बनाई। ऐसा करके उन्होंने गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी नाम दर्ज कराया है। मूर्तियों को कांच के एक बॉक्स में सुरक्षित रखा गया है।

गेहूं के दाने से भी छोटा होता है शिवलिंगी बीज

शिवलिंगी बीज को शिवलिंगी बेल से प्राप्त किया जाता है। इसके पत्ते भी त्रिशूल के समान होते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम 'द बाइनी' है। आकार में यह गेहूं के दाने से भी छोटा होता है। आयुर्वेद में इसका प्रयोग दवा के रूप में होता है। वहीं, धार्मिक रूप से इसे प्राकृतिक व स्वयं भू-शिवलिंग भी कहा जाता है। यह हिमालय व अमरकंटक में पाया जाता है।

सौ प्रतिशत सकारात्मक ऊर्जा

मूर्तियों का हर बीज शिव शक्ति का रूप है। शिवलिंगी बीजों में सौ प्रतिशत सकारात्मक ऊर्जा होती है। अब छाबड़ा शिव शक्ति कवच बनाने में जुट गए हैं। मंदिर में शिवलिंग बीजों से निर्मित मूर्तियां आने के बाद से मंदिरों में भक्तों की संख्या बढ़ी है। - तुलसीराम महाराज, मंदिर के महंत

पहली बार देखा तभी से आकर्षित

पहली बार शिवलिंगी बीज शहडोल के जंगल में देखे, तब से आकर्षित हुआ। गांव और जंगल में जाकर इन्हें खोजा और इकट्ठा किया। अभी तक मुंबई, उज्जैन और खजराना मंदिर में मूर्तियों का प्रदर्शन किया। - जगजीतसिंह छाबड़ा, कलाकार