Indore News: शास्त्रीय संगीत गुरु पद्मभूषण डा. गोकुलोत्सव महाराज। यह शहर नृत्य, संगीत, कला, खानपान की दृष्टि से सर्वोत्तम रहा है और है। जिससे प्रेरणा लेकर सुदूरवर्ती क्षेत्रों में भी संस्कृतिमय, संस्कारमय जीवन की छाप पड़ी है। शहर का अलहदा खानपान जिसमें अलग-अलग प्रांतों के जायकों का समावेश, सांस्कृतिक वार्तालाप और गोष्ठियां, संगीतमय महोत्सव की छाप, कविताओं के माध्यम से मालवी आम की दावत, दंगल में कुश्ती का दौर, अखाड़ों में अभ्यास सब कुछ इस शहर ने देखा है, जिया है। इस शहर ने देश को बड़े-बड़े कलाकार दिए हैं। यह परंपरा आज भी गति व प्रगति को आगे बढ़ाए हुए है। जिस तरह इंजीनियर तकनीक और सुविधा के साथ अपने दृष्टिकोण का समावेश करते हुए भवन बनाता है, स्वर्णकार आभूषणों में नवाचार करता है उसी तरह शहर में भी संगीत के क्षेत्र में कई नवाचार हुए और लगातार हो रहे हैं।

यह वह शहर है जहां पहले कलाकार जब मंचीय प्रस्तुति देते थे तो रसिक श्रोतागण चातक की तरह लालायित रहते थे। 1960 में जब मैंने मंचीय प्रस्तुति देना शुरू किया तब भी कला-संस्कृति को लेकर शहर की फिजा अलग ही थी। यहां बड़े-बड़े आयोजन होते थे। तब यह आयोजन घंटाघर (गांधी हाल) में होते थे। कई ख्यातनाम कलाकार शहर में प्रस्तुुति देने के लिए आमंत्रित किए जाते थे। वह दौर आकाशवाणी का था और उसकी बदौलत कई लोग कानसेन से तानसेन तक का सफर तय कर पाए। राजाश्रय के कारण शास्त्रीय संगीत की जो परंपरा शहर में बढ़ी उसके विकास में गुरुकुल परंपरा का बहुत योगदान रहा।

उस दौर में संगीत साधकों के लिए गुरुकुल परंपरा की सुविधा तो थी लेकिन आज की तरह 'क्लासेस' का चलन तब नगण्य ही था। प्रबंध ध्रुपद धमार, शास्त्रीय संगीत और हवेली संगीत का जो ज्ञान मुझे परिवार ने विरासत में दिया उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए 1972 में जीएमएस गुरुकुल की स्थापना की। प्रशिक्षण के साथ नवाचार करते हुए सर्वांग गायकी का सृजन हुआ जिसमें प्राचीन रुद्रमत, विष्णुमत, हनुमानमत, भरतमत, नारदमत की विधाओं को अपने दृष्टिकोण से क्रियान्वित किया। मधुप्रिया के नाम से पांच हजार से अधिक गोप रचनाओं का निर्माण किया।

सात पीढ़ी से परिवार इंदौर में

सात पीढ़ी से इंदौर में रह रहे हमारे परिवार में संगीत की विरासत को बहुत करीब से बसते, बढ़ते और बदलते देखा है। 1980 के दशक में शहर में कला-संस्कृति के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया। 'आर्ट क्लासेस' की संख्या बढ़ने लगी। आज कलाकार के लिए कक्षाएं संचालित करना विवशता हो गई है। कलाकार पर कला की परंपरा को बचाए रखने की भी जिम्मेदारी है तो परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व भी है। जहां तक बात सांस्कृतिक आयोजन की है तो जो आयोजन सादगीपूर्ण ढंग से लेकिन वृहद स्तर पर होते थे उनका स्वरूप अब बदल गया है। सादगीपूर्ण आयोजनों में भी मूर्धन्य कलाकारों के आगमन की परंपरा पहले की तरह नहीं लेकिन आयोजन का होना बदस्तूर जारी है।

Posted By: Sameer Deshpande

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