प्रभु जोशी प्रगतिशील कहानीकारों की अग्रिम पंक्ति के रचनाकार थे। अपनी लंबी कहानियों के लिए वे अलग से पहचाने गए। उनका एक संग्रह भी आया 'प्रभु जोशी की लंबी कहानियां'। एक अन्य संग्रह 'किस हाथ से' भी चर्चा में रहा था, जिसे बाद में मप्र साहित्य परिषद ने अखिल भारतीय पुरस्कार दिया। मप्र सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा उन्हें मुक्तबोध फैलोशिप के लिए चुना गया था। वे चिंतक, विद्वान और भाषा विद् थे। भाषा की दुर्दशा पर उनकी चिंता अनेक लेखों में पढ़ी जा सकती है। भाषाओं का नष्ट और विकृत होना, उनकी पड़ताल के विषय थे। कहानीकार होने के साथ-साथ वे अखिल भारतीय स्तर के चित्रकार भी थे। दिल्ली, मुंबई, भोपाल और इंदौर में उनकी प्रदर्शनियां लगती रहती थीं। जब वे आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिकारी थे, तब उनके द्वारा रचे गए अनेक कार्यक्रम अखिल भारतीय स्तर पर प्रस्तुत किए गए। इंदौर का दूरदर्शन केंद्र प्रभु जोशी के रहते पूरे देश में जितना जाना गया, उतना अन्य किसी काल में नहीं। वे अंग्रेजी के भी अध्येता और विद्वान थे। इंदौर के गुजराती कालेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक पद पर भी उनका चुनाव हो गया था। पत्रकारिता में उनका दखल था। वर्षों उन्होंने नईदुनिया से जुड़कर संपादकीय विभाग को समृद्ध किया। नगर में होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों में उनसे प्राय: भेंट होती थी। सूत्रधार के कार्यक्रम में कुछ दिन पूर्व वे मिले थे। उनका जाना इंदौर के लिए साहित्य जगत की बहुत बड़ी क्षति है। - प्रो. डा. सरोज कुमार, कवि और साहित्यकार

उनके रंग और शब्दों में मालवा की झलक रहती थी

प्रभु जी का जाना एक बहुआयामी व्यक्तित्व का विदा हो जाना है। उन्होंने भाषा, चित्रकला, प्रसारण, पत्रकारिता, नाटक और संपादन की विधाओं के नए सोपान रचे। साहित्य में उनका कद कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, रवींद्र कालिया के बाद की पीढ़ी में बड़े आदर के साथ शामिल किया जाता रहा है। जलरंगों को लेकर उनकी कूची ने विलक्षण रूपाकार रचे हैं। नई प्रतिभाओं की रहनुमाई में उन्हें गहन दिलचस्पी थी। यह एक अल्पज्ञात तथ्य है कि प्रभु जी के कारण आकाशवाणी इंदौर के प्रयोगधर्मी नाटकों को राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्राप्त किए। वे विश्व के नामचीन लेखकों के गहन स्वाध्यायी थे और हिंदी अखबारों की बारोन्मुख होती जा रही भाषा को लेकर उन्होंने निरन्तर आक्रामक लेखन किया। जलरंगों को लेकर रची गई उनकी चित्र श्रृंखला को देश विदेश के कई पुरस्कार मिले। वाटर कलर में उनका काम ललित कला विधा का अनमोल दस्तावेज है। प्रभु जोशी का निधन मालवा के रंग, शब्द और स्वर की संपदा में एक पीड़ादायक रिक्तता दे गया है। - संजय पटेल, संस्कृतिकर्मी

ज्ञान के हिमालय के समान थे प्रभु जोशी

ज्ञान के अंतरराष्ट्रीय क्षितिज, प्रकांड साहित्यकार व चित्रकार, मां शारदा के वरद पुत्र प्रभु जोशी मेरे बचपन के मित्र रहे। अपने पिता माखनलाल जोशी की तरह ही प्रभु भी उच्च आदर्शों को मानने वाले थे। छोटे से गांव से विद्या अध्ययन कर लेखन और चित्रकार के रूप में अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की। वे ज्ञान के हिमालय के समान थे। वे जितने अच्छे साहित्यकार थे उतने ही परोपकारी और करुणा से भरे थे। वे कभी किसी की मदद करने में पीछे नहीं रहते थे। देश-विदेश के कई बड़े पुरस्कार मिलने के बाद भी वे हमेशा मृदु रहते थे। उनके चित्र जीवंतता की मिसाल होते थे और प्रेरणा देते थे। - डा. तेजप्रकाश पूर्णानंद व्यास, से.नि. प्राचार्य और प्रभु जोशी के बचपन के मित्र

Posted By: Prashant Pandey

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