MP Urban Body Elections 2022: इंदौर। नईदुनिया प्रतिनिधि। नगर निगम की पार्षदी राजनीति की शुरुआत मानी जाती है। पार्षद बनने के बाद राजनीति में आगे बढ़ने की महत्वकांक्षा बड़े पदों तक ले जाती है। इंदौर में वर्ष 1983 के चुनाव से राजनीतिक कैरियर शुरू करने वाले कुछ नेता विधायक, सांसद, मंत्री के अलावा संगठनों में राष्ट्रीय पदों तक पहुंच चुके है। 80 के दशक में कैलाश विजयवर्गीय, तुलसी सिलावट, सज्जन सिंह वर्मा, महेंद्र हार्डिया, गोपी नेमा सहित पार्षद बने थे। ज्यादातर नेता राजनीति में बड़ा मुकाम पा चुके है।

डंगर को हराकर पार्षद बने थे विजयवर्गीय

80 के दशक में श्रमिक क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। नगर निगम चुनाव में उम्मीदवार खड़े करने के लिए भाजपा को नेता तक नहीं मिलते थे। तब नंदानगर वार्ड से कांग्रेस के कद्दावतर नेता बाबू सिंह डंगर के सामने भाजपा ने कैलाश विजयवर्गीय को टिकट दिया। विजयवर्गीय के साथ तब वार्ड के युवा जुड़े और चुनाव में भाजपा जीत गई। इस सफलता के बाद विजयवर्गीय ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

1989 के चुनाव में विजयवर्गीय को पहले दो नंबर विधानसभा क्षेत्र से टिकट देने की तैयारी की गई,लेकिन बाद में कुशाभाऊ ठाकरे ने उन्हें चार नंबर विधानसभा क्षेत्र का टिकट दे दिया और दो नंबर से विष्णुप्रसाद शुक्ला ने चुनाव लड़ा। चार नंबर विधानसभा क्षेत्र से विजयवर्गीय ने चुनाव जीत लिया। बाद में दो नंबर विधानसभा क्षेत्र, महू से विधायक बने, प्रदेश सरकार में पीडब्लूडी, उद्योग, नगरीय प्रशासन विभाग के मंत्री भी रहे। बाद में केंद्र की राजनीति में चले गए और फिलहाल भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव है।

जूनी इंदौर से नई दिल्ली तक का राजनीतिक सफर

कांग्रेस विधायक सज्जन सिंह वर्मा भी 1983 में नारायण धनोरा को हराकर पार्षद बने थे। इसके बाद वर्मा को कांग्रेस पार्टी ने सोनकच्छ विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया। उन्होंने लगातार सोनकच्छ से चुनाव जीता और दिग्विजय सिंह सरकार में 10 वर्षों तक महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रहे। बाद में कांग्रेस ने उन्हें देवास संसदीय क्षेत्र का टिकट दिया। चुनाव जीत कर वे सांसद भी बन गए और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव के महत्वपूर्ण पद पर रहे। फिलहाल वे सोनकच्छ से विधायक है।

सिलावट की राजनीतिक शुरुआत भी निगम चुनाव से

प्रदेश के जलसंसाधन मंत्री तुलसी सिलावट भी 40 साल पहले पार्षद का चुनाव जीते थे। इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें सांवेर भेज दिया। तब से वे ग्रामीण राजनीति की महत्वपूर्ण कड़ी बन गए। सांवेर वे चार बार चुनाव जीत चुके है। एक बार कांग्रेस ने उन्हें उज्जैन संसदीय क्षेत्र से भी टिकट दिया था, लेकिन वे चुनाव हार गए। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने सांवेर से फिर उपचुनाव लड़ा और जीत गए। कमल नाथ सरकार में सिलावट मंत्री रहे अौर भाजपा सरकार में भी वे कैबिनेट मंत्री है।

हार्डिया ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा

महेद्र हार्डिया भी अग्रवाल नगर वार्ड से 1983 में पार्षद का चुनाव लड़े थे,हालांकि 1994 में हुए चुनाव में वे छोटे यादव से हार गए थे, लेकिन इसके बावजूद भाजपा ने उन्हें संगठन की कमान सौंपी। 10 साल तक वे भाजपा के नगर अध्यक्ष रहे। बाद में वे पांच नंबर विधानसभा क्षेत्र से पहली बार चुनाव जीते और 15 वर्षों से वे विधायक हैै। प्रदेश सरकार में वे स्वास्थ्य मंत्री भी रह चुके है।

नेमा पहले पार्षद बने, फिर विधायक

गोपीकृष्ण नेमा की राजनीति भी निगम चुनाव से शुरु हुई। वे तीन नंबर विधानसभा क्षेत्र के ही एक वार्ड से पार्षद बने। फिर पार्टी ने उन्हें तीन नंबर विधानसभा क्षेत्र का टिकट दिया। वे 10 सालों तक क्षेत्र के विधायक रहे। बाद में अश्विन जोशी से वे विधानसभा चुनाव हार गए। पार्टी ने उन्हें नगर अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी दी। कांग्रेस के विधायक और पूर्व मंत्री तक का सफर कर चुके ललित जैन पहले रह चुके है।

महाजन और शेखावत बने थे एल्डरमैन

सांसद और लोकसभा स्पीकर बन चुकी सुमित्रा महाजन को 1983 में नगर निगम में पदेन पार्षद (एल्डरमैन) बनाया गया था। तब भंवर सिंह शेखावत भी एल्डरमैन बने थे। शेखावत भी पांच नंबर विधानसभा क्षेत्र और बदनावन के विधायक रह चुके है।

सिर्फ पार्षद बने, बाद में कोई चुनाव नहीं जीत पाए।

1993 की राजनीतिक बैच में पंकज संघवी ऐसे नेता थे, जो भाजपा के टिकट से पार्षद बने थे, लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ले ली। कांग्रेस ने उन्हें पांच नंबर विधानसभा क्षेत्र से विधायक, इंदौर संसदीय क्षेत्र से सांसद और मेयर का टिकट दिया, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाए। वे दो बार सांसद का चुनाव लड़ चुके है।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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