अनिल त्रिवेदी, इंदौर। चंद रोज पहले 26 नवंबर को जिंदगी के 67 साल पूरे करने वाले देश के आलातरीन शायर जनाब मुनव्वर राना इन दिनों चलने के लिए बैसाखियों का सहारा लेते हैं। मगर उन्हें ऐसा करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता। कहते हैं कि या तो ऊपरवाला एक दफा फिर से मुझे छड़ी के सहारे चलने की तौफीक (सामर्थ्य) अता फरमाए या ह्वीलचेयर पर ही ला दे, ताकि चलने-फिरने का झंझट ही न रहे। लेकिन खास बात ये है कि जिस्मानी तौर पर भले ही वो कितने ही कमजोर हो गए हों मगर इंदौर का नाम सुनते ही खिल उठते हैं। इसकी निशांदेही उनकी उल्लासित आवाज से होती है। इस शहर से उनकी दिली मुहब्बत इस बात से ही साबित होती है कि उन्हें वो तारीख तक याद है जब वो इंदौर पिछली बार आए थे। मैंने जैसे ही कहा कि इंदौर के नईदुनिया अखबार से बोल रहा हूं, उधर से फौरन जवाब आया कि हां, वहां मैं पिछली बार दो साल पहले 11 दिसंबर को आया था।

अब इसे राहत साहब से उनकी मुहब्बत का जादू कहें या इंदौर की हर किसी को मोह लेने की खासियत। लेकिन मुनव्वर बेहद साफगोई से फरमाते हैं कि अगर किसी वजह से मरने के बाद मुझे अपनी जन्मभूमि रायबरेली की मिट्टी नसीब न हो सके तो मुझे इंदौर में ही दफ्न कर दिया जाए क्योंकि इस शहर से मेरी इतनी अच्छी यादें जुड़ी हुई हैं कि मैं मरने के बाद भी उन्हें साथ ले जाना चाहता हूं।

ये बात मैं इंदौर के एक मुशायरे में भी कह चुका हूं और बिला शक आज भी उस पर पूरी तरह कायम हूं। मुझे याद है कि एक बार इंदौर में दो गुटों में कुछ तनाव हो गया था। इत्तेफाक से उस वक्त मैं इंदौर में था। समझाइश के लिए मुझे बुलाया गया। दोनों तरफ मेरे मुरीद थे और बात की बात में मसला हल हो गया।

गुजरे दौर की महबूबा जैसा लगता है इंदौर

राहत साहब के कमाल के अदबी फन की बेइंतहा इज्जत करने वाले राना साहब कहते हैं कि वो उम्र में भी मुझसे दो साल बड़े हैं और इल्म में भी। मैंने उनकी खिदमत में कभी अर्ज किया था कि 'तेरे एहसान की ईंटें लगी हैं इस इमारत में, हमारा घर तेरे घर से कभी ऊंचा नहीं होगा"।

मुझे याद है कि दशकों पहले इंदौर में पहली बार मुशायरा पढ़ने के लिए राहत ही मुझे मुंबई से ले गए थे। उस वक्त हम सब एक बस में सवार होकर गए थे और तब उन्होंने इंदौर के हर चौराहे, हर सड़क और हर गली-मोहल्ले को मेरे नाम से ऐसा रंग दिया था कि जिस तरफ देखो मेरी ही बात हो रही थी।

मेरे बारे में इतने किस्से-कहानियां फिजा में तैर रहे थे कि मैं खुद हैरान था। वो तमाम बातें याद करके मुझे इंदौर गुजरे दौर की महबूबा जैसा लगता है। बेशक ये शहर अब सफाई में मुसलसल नंबर वन आ रहा है लेकिन इसकी तासीर मुझे उस वक्त से बेहद पसंद है जब यहां बहुत ऊंची-ऊंची इमारतें और चौड़ी-चौड़ी सड़कें नहीं होती थीं। उस वक्त भी वहां मुझे शायरी के कद्रदानों का बेपनाह प्यार मिलता था।

... ताकि खुशहाल रहें आने वाली नस्लें

जिंदगी के आखिरी सफर पर निकलने से पहले मैं देश को एक बार फिर से गंगा-जमनी तहजीब से लबरेज देखना चाहता हूं। चाहता हूं कि मेरे नाती-पोतों के हिस्से में भी वही हिंदुस्तान आए जिस पर हमें हमेशा से नाज रहा है। मुझे यकीन है कि मुल्क के हालात बेहतर होंगे और आने वाली नस्लें खुशहाल होंगी। अगर मेरे जीते जी वो लम्हा आ गया तो मैं 'साहित्य अकादमी अवार्ड" सरकार से वापस मांग लूंगा।

दरअसल हम शायर बहुत संवेदनशील होते हैं। इसलिए दुश्वार हालात में भी बात सलीके से ही करते हैं। 'फुटपाथ पर भी होगी महल की जबान में, हम गुफ्तगू करेंगे गजल की जबान में"। अब इन इशारों को सियासतदां समझ लें तो अच्छा है।

जिंदगी बड़ी हसीन है मगर एक न एक दिन सबको ऊपरवाले के हुजूर में हाजिर होना है। इसलिए मेरा मशवरा है कि मौत की नजरअंदाजी कतई न करें। 'जश्न-ए-राहत" में शरीक होने के लिए शहर आ रहे इस अजीम शायर ने अपनी बात इस शेर के साथ मुकम्मल की। 'आखिर कोई सूरत भी हो इस खाना-ए-दिल की, काबा नहीं बनता है तो बुतखाना बना दे"।

Posted By: Sandeep Chourey

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