इंदौर।

मैं जब उस्ताद गुलाम अली से तालीम ले रहा था तो उनसे बहुत प्रभावित हुआ। मुझे लगा कि मुझे भी अपने नाम के साथ हुसैन के बजाए अली लगाना चाहिए, क्योंकि अली में बहुत वजन है। ऐसा नहीं कि हुसैन की अहमियत कम है, लेकिन अली नाम ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैंने जब अपने वालिद से पूछा कि क्या मैं अपने नाम के साथ अली लगा सकता हूं तो उन्होंने रजामंदी दे दी। इस तरह जावेद हुसैन से मैं जावेद अली बन गया और अली लगाते ही मेरी जिंदगी निखर गई। वाकई में अली नाम में बहुत वजन है। यह बात ख्यात प्लेबैक सिंगर जावेद अली ने खुद साझा की और इसके साथ ही कई ऐसे पहलुओं को साझा किया, जिनके बारे में उनके प्रशंसकों को भी कम ही जानकारी है।

महेश्वर में जारी निमाड़ उत्सव में प्रस्तुति देने आए जावेद अली बुधवार को शहर के सारेगामा म्यूजिक इंस्टीट्यूट में भी आए। जहां उन्होंने न केवल संगीत साधकों और संगीत रसिकों से चर्चा की, बल्कि मीडिया से भी मुखातिब हुए। जावेद ने कहा कि हर बात की एक नियति होती है और मेरे साथ भी यही हुआ। फिल्म 'जोधा-अकबर' के गीत 'जश्न-ए-बहारा' के लिए जो फिल्म फेयर अवार्ड मिला, जिससे मेरी पहचान बनी, वास्तव में वह गीत फिल्म में था ही नहीं। इसके बजाए मुझसे तो पहले कव्वाली गवाई गई थी, जो 5-6 रागों में थी, लेकिन उस कव्वाली की बजाए 'ख्वाजा मेरे ख्वाजा' गीत को शामिल कर लिया गया। इस दौरान एक रोमांटिक सॉन्ग की दरकार हुई और मुझे 'जश्न-ए-बहारा' गीत दिया गया। इस गीत ने मेरी पहचान रोमांटिक गीतों के क्षेत्र में बनाई। मगर आज भी मुझे उस कव्वाली के रिलीज होने का इंतजार है।

कहीं मेरा खुदा मुझसे नाराज न हो जाए

जब कोई इंसान किसी मकाम पर पहुंचता है तो उसमें कामयाबी के साथ कई विकार भी आ जाते हैं। मगर मेरे पिता हमीद हुसैन ने मुझे यही सिखाया कि कितने भी बड़े मुकाम पर पहुंच जाओ नजरें हमेशा नीची ही रखना, इसलिए मैं कभी यह नहीं चाहता कि मेरी वजह से किसी का दिल दुखे। मुझे लगता है कि यदि मेरी वजह से किसी एक व्यक्ति का दिल भी दुखा तो कहीं मेरा खुदा मुझसे नाराज न हो जाए।

तुरंत अवार्ड के बारे में नहीं सोचें

चूंकि जावेद अली विघार्थियों से रूबरू हो रहे थे, इसलिए उन्होंने विघार्थियों के पैरेंट्स से कहा कि शास्त्रीय संगीत की जिसने शिक्षा ले ली, वह हर जोनर के गीत में खरा उतर सकता है। यह नींव मजबूत करता है, मगर जरूरी है कि पैरेंट्स और स्टूडेंट्स दोनों ही तुरंत अवार्ड के बारे में न सोचें। पैरेंट्स बच्चों की क्षमता और रुचि को समझें तथा उन्हें वक्त दें। हर बच्चा अपने आप में खूबी लिए होता है। जहां तक बात शिक्षा की है तो बतौर शिष्य आपको जिससे भी गुण मिले ग्रहण कर लें। सच्चा गुरु कभी यह नहीं चाहेगा कि उसका शिष्य केवल उससे ही बंधकर रहे। शिष्य को आगे बढ़ाने के लिए वह शिक्षा लेने के लिए उसे आजाद ही रखेगा।

Posted By: Nai Dunia News Network