Naidunia Ke Sang Indore Ka Man : डा. जैनेंद्र जैन। यह मेरे लिए किसी अविस्मरणीय जीवनानुभव से कम नहीं कि मैं नईदुनिया के लिए "इंदौर का मन" स्तंभ लिख रहा हूं। वस्तुत: इंदौर और नईदुनिया, ये दोनों ही बचपन से मेरे मन के करीब रहे। इंदौर ने मुझसे दोस्ती निभाई तो नईदुनिया ने मेरे मन से अपनापन बनाए रखा। आज देश-दुनिया के बारे में मैं जो कुछ भी जानता, समझता, बूझता हूं...वह इंदौर के सहोदर कहे जाने वाले इस अखबार के कारण ही है।

जहां तक इंदौर की बात है, तो इसके बारे में कुछ भी लिखने से पहले मैं कहूंगा कि कोई इस शानदार शहर को काजल का काला टीका लगा दो यार। कहीं मेरे इस प्यारे शहर को किसी की नजर न लग जाए। इंदौर वो शहर है, जिसमें अपनों के लिए तो अपनापन है ही, परायों के लिए भी इसकी गोद सदैव खुली हुई है। इसका प्रमाण इंदौर की आज की जनसांख्यिकी है, जिसमें जितने लोग यहां के स्थानीय निवासी हैं, उतने ही बाहर से आकर इंदौरी हो चुके हैं। न मानो तो अपने आसपास के दो-चार घरों में जाकर पड़ताल तो करो जरा, कोई न कोई कह ही देगा- हम तो उज्जैन, रतलाम, खंडवा या महाराष्ट्र, राजस्थान से यहां कामकाज के लिए आए थे, फिर यहीं के होकर रह गए। मुझे तो लगता है, हो न हो भारत की "अतिथि देवो भव:" की अद्भुत परंपरा कभी इंदौर की धरती पर ही रची गई हो। जिन्हें यह बात अतिशयोक्ति लगती हो, वे एक बार यहां के आतिथ्य का आनंद लेकर देखें। कहीं और मत जाइए, मेरे ही घर पधार जाइए।

वस्तुत: यह शहर उत्सवप्रिय है, जागरूक है, सुंदर है, स्वच्छ है, तेजतर्रार है और संवेदनशील भी है। यहां दिल्ली, मुंबई जैसी आधुनिक सुविधाएं भी हैं तो गांव-कस्बों की सौंधी गंध भी। ऐसा काम्बो पैक देश के किसी अन्य शहर में मुझे तो दिखाई नहीं देता। खैर, बहुत प्रशंसा हो गई इंदौर की। अब थोड़ी बुराई, ताकि नजर न लगे। ...तो बुराई ये कि यहां ट्रैफिक ठीक नहीं है। हरियाली खत्म हो रही। अपन सब ये दो समस्याएं सुधार लें, तो इंदौर निर्विवाद रूप से सबसे शानदार हो जाएगा।

मेरे मन की याद गली - 70 से 90 के दशक में नईदुनिया में मेरे कई पत्र छपे। इससे मुझे प्रदेश में प्रतिष्ठा व पहचान मिली। 1980 में पत्र लेखक मित्र (स्व.) जाकिर अली मरहूम व मैंने मिलकर मप्र पत्र लेखक संघ का गठन किया और पत्र लेखकों के सात सम्मेलन किए। जनार्दन ठाकुर, कन्हैयालाल नंदन, अरुण शौरी, राजेंद्र अवस्थी, राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गज पत्रकार अतिथि के रूप में आए। उनके आने व पत्र लेखकों से मिलने की मधुर स्मृतियां आज भी मेरे मन के पटल पर चंदनगंध की तरह अंकित हैं।

(लेखक समाजसेवी, दिगंबर जैन समाज की सामाजिक संसद के सदस्य व मप्र पत्र लेखक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष हैं)

Posted By:

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close