Naidunia Ke Sang Indore Ka Man : जयसेन जैन। यदि हम इतिहास पर गहरी नजर डालें तो पाएंगे कि इंदौर में लोक-संस्कृति, संस्कार व कठोर परिश्रम से जीत हासिल करने की प्रबल इच्छा हमेशा बनी रही। इंदौर के रक्त में यह गुण मां अहिल्याबाई होलकर के दौर से हैं। चाहे सामाजिक, वैचारिक झंझावात आए हों या आर्थिक मंदी जैसे हतोत्साहित करने वाले क्षण, इंदौर हमेशा दृढ़संकल्पित रहा व आगे बढ़ता रहा। इंदौर के लोगों ने सपने देखना और उन्हें पूरा करना कभी नहीं छोड़ा।

इंदौर के मन में धार्मिक आस्था के साथ-साथ खेल, साहित्य व कारोबार के प्रति हमेशा गहरा प्रेम रहा। यहां के शासक यशवंतराव होलकर क्रिकेट के बड़े शौकीन थे। उनकी होलकर क्रिकेट टीम में उस समय सीके नायडू, मुश्ताक अली जैसे दिग्गज खिलाड़ी थे। यशवंत क्लब के मैदान पर ही अभ्यास होता था। कोई विदेशी टीम तब भारत आती, तो होलकर टीम से उसका तीन दिवसीय काउंटी मैच अवश्य होता। नौलखा स्थित चिड़ियाघर पहले टापू का बगीचा कहलाता था। यहां जब फिल्म आन की शूटिंग हुई थी, तो इसे देखने पूरा शहर उमड़ पड़ा था। इसी फिल्म के कुछ दृश्य लालबाग में भी शूट हुए थे।

इस शहर ने अपनी परंपराओं, धर्म उत्सवों को हमेशा सीने से लगाकर रखा। यही वजह है कि यहां हर त्योहार बहुत उल्लास के साथ मनाया गया। होलकर शासन में तुकोजीराव व यशवंतराव होलकर बग्घियों में लाव-लश्कर के साथ दशहरा मैदान जाते और वहां शमी वृक्ष की पूजा कर लौट आते। लोग सोना पत्ती का आदान-प्रदान करते व दशहरा मनाते। कालांतर में श्रमिक नेता गंगाराम तिवारी ने दशहरा मैदान पर रावण दहन की प्रथा प्रारंभ की। तबसे नगर के अनेक क्षेत्रों में यह प्रथा शुरू हुई और दशहरा रावण दहन करके मनाया जाने लगा।

मुझे याद है, कपड़ा मिलों में अपराह्न व रात में भोंपू (सायरन) बजते। बिजासन टेकरी पर रोज दोपहर 12 बजे तोप दागी जाती थी। उनकी आवाज से लोग अपनी घड़ियां मिलाते थे। दरअसल, यह शहर सदैव अपने आनंद में डूबा रहा, इसीलिए सुखी बना रहा। (लेखक अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा के उपाध्यक्ष व दिगंबर जैन उदासीन श्राविकाश्रम ट्रस्ट के महामंत्री हैं)

मेरे मन की याद गली - मुझे वह समय याद आता है, जब नगर में कुल पांच सिनेमाघर थे...रीगल, प्रकाश, श्रीकृष्ण, महाराजा व अरुण (एलोरा)। इनमें फिल्में लगतीं और लोग टूट पड़ते। महाराजा टाकीज में जब पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर ने मुंबई से यहां आकर नाटक प्रस्तुत किया तो दो रुपये का टिकट लेकर मैं भी देखने पहुंचा था। नाटक समाप्त हुआ तो पृथ्वीराज कपूर ने थियेटर से बाहर आकर मुंबई में पृथ्वी थियेटर के भवन निर्माण हेतु झोली फैलाकर चंदा एकत्रित किया था। मुझे भी उस महान व्यक्ति के महान स्वप्न को पूरा करने में अपना गिलहरी-योगदान देने का अवसर मिला था। मैं तब बच्चा था इसलिए अपनी बचत से चवन्नी ही उनकी झोली में डाल पाया था। उसे भी उन्होंने सम्मान से स्वीकारा था।

Posted By: Hemraj Yadav

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