Naidunia Ke Sang Indore Ka Man : अरुण मोरोणे। इस शहर को मैंने उस वक्त से देखा है, जब यह चांद सा था। अर्थात था तो तब भी सुंदर, लेकिन चांद की तरह यहां भी गड्ढे ही नजर आते थे। एक आज का वक्त है, जब शहर स्मार्ट सिटी में तब्दील हो रहा है और विकास की परंपरा सतत जारी है। मैंने अपने इंदौर को सुव्यवस्थित और आधुनिक शहर बनते देखा है। इस शहर की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि एक बार जो यहां आता है, यहीं रम जाता है। यहां के लोग उसे दिल से अपना लेते हैं। इस शहर की खूबियों में मदद की भावना और मिलनसारिता भी हैं।

इस शहर की तासीर, परंपरा और संस्कार में संगीत बसा हुआ है। प्रदेश की राजधानी गर भोपाल है, तो इंदौर संगीत का गढ़ है। उस्ताद अमीर खां, जहांगीर खां, बंडू भैया चोघुले, मामा साहेब मुजुमदार, शरद खरगोणकर, दद्दू खां आदि यहीं के थे। इसका लाभ यह हुआ कि यहां संगीत रवायत की तरह घुल मिल गया, एक संस्कार बन गया जो कि अन्य शहरों से अलग है। पहले राज्याश्रय में होने के कारण कलाकारों को सम्मान और सम्मान निधि मिला करती थी। जब यह लोकाश्रय में आई, तब भी यह सिलसिला जारी रहा। कुछ अन्य शहरों में हमने देखा है कि स्थानीय कलाकारों को कमतर आंका जाता है, लेकिन इंदौर में ऐसा नहीं है। आयोजन कैसा भी हो, कलाकार कोई भी हो, सबको पूरा मान मिलता है। नामी कलाकारों को भी समारोह में आमंत्रित किया जाता है, तो नवोदितों को भी मौका मिलता है।

दो दशकों में इंदौर के संगीत क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव आया है। एक वक्त था जब मामा मुजुमदार, सांघी समारोह जैसे कुछ ही आयोजन होते थे, लेकिन अब शास्त्रीय संगीत के कई बड़े-छोटे आयोजन होने लगे हैं। सुनने और सीखने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। युवा संगीत से जुड़ने लगे हैं, जो भविष्य के लिए सुखद संकेत है।इंदौर में बहुत कुछ बेहतर हुआ। शासन, प्रशासन व नागरिकों ने शहर को नई दिशा दी। अब आवश्यकता है यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने की। ट्रैफिक बेतरतीब है। इसमें सुधार हो।

मेरे मन की याद गली - बात करीब दस बरस पुरानी होगी। एक सभागृह में शास्त्रीय गायिका विदुषी अलका देव मारूलकर का गायन जारी था। तबले पर पं. उल्हास राजहंस थे। प्रस्तुति के बीच में उनका तबला फट गया, लेकिन उन्होंने प्रस्तुति रुकने नहीं दी और डग्गे पर ही वादन करते रहे। किसी के कुछ कहे बिना ही दर्शकों में बैठे तबला वादक हितेंद्र दीक्षित ने चंद मिनटों में तलबे की नई जोड़ी मंच पर पहुंचा दी। यह इंदौर है जहां एक ही विधा का कलाकार भी आपस में राग-द्वेष नहीं रखता।

(लेखक वरिष्ठ सितार वादक और लता मंगेशकर शासकीय संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य हैं)

Posted By: Hemraj Yadav

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