- संस्था सूत्रधार के कार्यक्रम 'कैफी की याद' में मशहूर उर्दू अध्येता अजीज इरफान का उद्बोधन

इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर

कैफी आजमी का शुमार मैं उन चंद कलमकारों में करता हूं,जिन्होंने अपनी कलम के साथ कभी बेवफाई नहीं की। कलमकारी के जरिए उन्होंने दुनिया को जो नसीहतें दीं, उस पर खुद भी अमल किया। इसकी मिसाल है आजमगढ़ का मिजवां गांव, जहां कैफी की पैदाइश हुई थी। इस गांव की रंगत कैफी साहब ने इस कदर बदल दी कि आज वहां तमाम आधुनिक सुख-सुविधाएं मुहैया होने लगी हैं। उनकी चाहत तो पूरे देश को बेहतर बनाने की थी, लेकिन पैरालिसिस के बाद वो काफी कमजोर हो गए थे। इसके बावजूद उन्होंने मिजवां की तरक्की की बानगी पेश कर साबित कर दिया कि हौसले बुलंद हों तो इरादे जरूर पूरे होते हैं।

ये विचार 'कैफी की याद' कार्यक्रम में उर्दू के अध्येता अजीज इरफान ने व्यक्त किए। रविवार शाम संस्था 'सूत्रधार' द्वारा प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने 'इंसानियत का शायर कैफी' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि सज्जाद जहीर उन्हें अपने साथ मुंबई ले गए थे। जहां कैफी ने फिल्मों में गीत लिखने शुरू किए, लेकिन उन्होंने फिल्मों को कभी अपनी मंजिल नहीं बनाया, क्योंकि उनका मकसद तो जुल्मों में जकड़े इंसान को आजाद कराना था। लेकिन जब आजादी के बाद भी कैफी साहब ने महसूस किया कि हालात नहीं बदल रहे हैं और गरीब तो गरीब ही है तो उन्होंने खुद को मिजवां तक ही समेट लिया।

वृत्तचित्र में नज्म सुनाते नजर आए कैफी

इस मौके पर कैफी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एकाग्र वृत्तचित्र भी दिखाया गया। जिसमें कैफी की बेटी शबाना आजमी ने बताया कि उन्हें उस समय बहुत ताज्जुब होता था, जब अब्बा दूसरे लोगों की तरह ऑफिस जाने के बजाय घर में ही रहते थे। लेकिन स्कूल में जब सहेलियां बतातीं कि फलां किताब में मेरे वालिद की गजल या नज्म आई है तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। इस फिल्म में कैफी अपनी मशहूर नज्म 'दूसरा वनवास' का पाठ करते भी नजर आए। ये नज्म उन्होंने अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 में हुई घटना के बाद लिखी थी।

फिल्म 'हीर रांझा' का प्रदर्शन

फिल्म में कैफी की पत्नी शौकत आजमी ने इकरार किया कि मैं बचपन से ही उन्हें चाहती थी। लेकिन इजहार-ए-इश्क नहीं कर पाती थी। आखिर में जब मैंने बहुत हिम्मत करके वालिद को ये बात बताई तो उन्होंने पहले तो बहुत समझाया, फिर बमुश्किल मान गए। उस समय कैफी को महज 45 रुपए वेतन मिलता था। जिनमें से 30 रुपए तो खाने-पीने में ही खत्म हो जाते थे। दूसरी जरूरतें पूरी करने के लिए हमें कई बार भूखा भी रहना पड़ता था। लेकिन उस वक्त के लीडर पीसी जोशी की सिफारिश से मुझे फिल्मों में छोटा-मोटा काम मिलने लगा और धीरे-धीरे हमारे दिन भी बदलने लगे। इस मौके पर कैफी के नगमों और संवादों से सजी मशहूर फिल्म 'हीर रांझा' का प्रदर्शन भी किया गया। चेतन आनंद द्वारा निर्देशित इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं राजकुमार और प्रिया राजवंश ने निभाई थीं।

(फोटो : आशू पटेल)

Posted By: Nai Dunia News Network

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