- 'आस्था वृद्धाश्रम' में संस्था 'महफिल-ए-सांग' के कलाकारों ने पेश किए सार्थक बोलों से सजे गीत, भावुक हुए वृद्धजन

इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर

वक्त ने कुछ ऐसी ठोकर मारी कि अपनों ने ही किनारा कर लिया। जिन बच्चों को बड़े अरमानों से पाला, खुद गीले में सोकर उन्हें सूखे में सुलाया, उनकी छोटी-छोटी खुशियों के लिए न जाने कितनी तकलीफें, कितने दुख उठाए, वही उम्र के अंतिम पड़ाव में हमें अकेला छोड़ पराए हो गए। ये व्यथा-कथा अपनों के ठुकराए उन बुजुर्गों की है, जो आस्था वृद्धाश्रम में अपना बुढ़ापा काट रहे हैं। सावन के महीने में जब इनसे मिलने 'महफिल-ए-सांग' के कलाकार पहुंचे तो बूढ़ी आंखों में अजब सी चमक आ गई। जिसे देख शायद इंद्रदेव का मन भी द्रवित हो उठा और आधा कार्यक्रम खत्म होते-होते आसमान पर काली घटा छा गई। बारिश भी आ गई और लाइट चली गई। मगर अंधेरे में भी बैटरी की रोशनी में कार्यक्रम जारी रहा।

'ओह रे ताल मिले नदी के जल में...'

'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, जिंदगी प्यार का गीत है, जीवन के दिन छोटे सही हम भी बड़े दिलवाले, ओह रे ताल मिले नदी के जल में, सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन, मधुबन में राधिका नाचे रे, सजन रे झूठ मत बोलो और 'तेरे जैसा यार कहां, कहां ऐसा याराना' जैसे सार्थक गीतों का दौर चला। इस बीच हुई बारिश के मद्देनजर फिजा में डम-डम डिगा-डिगा, बड़ी मस्तानी है मेरी महबूबा' जैसे गीत भी गूंजे। आरसी चौहान, पवन सिरसाट, डॉ. विजय सालवी, सुशील जैन, विपिन मेहरा, विजय शर्मा, डॉ. ललित शुक्ल, प्रवीण प्रजापति, मीनाक्षी, कल्पना जगताप, भूपेश भारद्वाज, सुनीता श्रीवास्तव, ऋषिकेश शर्मा, उदय तैलंग, निसार चौधरी, अमित शर्मा जैसे कलाकारों ने एक से बढ़कर एक गीत सुनाने के बाद बिदा ली तो वृद्धाश्रम की एक बूढ़ी मां, कार्यक्रम समन्वयक मदन एम.गुप्ता से कह उठी कि 'भिया कदी-कदी अई जाया करो, हमारा अपणा होन ने तो छोड़ीज दियो हे, अब तमारो ही सहारो हे'।

(फोटो : आशू पटेल)