- गुरु-शिष्य ने किया 'नृत्यांजलि' का मंच साझा

इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर

जिस कथक का उल्लेख हजारों साल पहले के अभिलेखों में भी मिलता है, उसे आधार लेकर कभी पौराणिक प्रसंगों को मंच पर उतारा जाता है तो कभी मौजूदा परिदृश्य को रागों में पिरोते हुए लयकारी के साथ साकार किया जाता है। इसी का उदाहरण रविवार की शाम नृत्य भारती के 51वें आयोजन में देखने को मिला, जहां रविवार की सुबह गरज के साथ बारिश ने दस्तक दी तो कलाकारों ने उसे भी नृत्य में शामिल कर लिया और जिस जिद के कारण राम के जीवन ने मोड़ लिया, उस वृत्तांत को भी मंच से प्रस्तुत किया गया।

लोकमान्य नगर के मंगल भवन में रविवार की शाम नृत्यांजलि कार्यक्रम आयोजित हुआ। गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में हुए इस कार्यक्रम में गुरुओं डॉ. शशिकांत तांबे (गायक) और जयश्री तांबे (नृत्यांगना) को नमन करते हुए शिष्यों ने प्रस्तुतियां दीं। कार्यक्रम की शुरुआत ईश वंदना 'ओमकार स्वरूपा' से हुई। इसके बाद कथक का शुद्ध शास्त्रीय स्वरूप पावनी कानूनगो, मैत्रेयी भाले और मनस्वी सुथार ने एक ताल में निबद्ध रचना के जरिए प्रस्तुत किया। कथक के शुद्ध शास्त्रीय स्वरूप की गरिमा के बाद इसके अभिनय प्रधान अंगों को लिए कुछ बंदिशों को एक राग में पिरोते हुए वर्षा नृत्य किया गया। यह प्रस्तुति दिन के तेवर देखते हुए और भी समसामयिक बन पड़ी थी, जिसे खूबसूरत अभिनय ने और भी आकर्षक बना दिया। वर्षा के वर्णन को मंच से करीब 15 शिष्याओं ने दर्शकों के समक्ष पेश किया। आयोजन में कई खास प्रयोग भी देखने को मिले, जिसमें अगला क्रम त्रिवेणी का था। द्रुत त्रिताल की इस रचना में विभिन्ना प्रकार के परणों की झड़ी थी और लयकारी का भी सुंदर समायोजन था। इस प्रस्तुति में शिष्य उर्वी गोरे, दीया तिवारी, कुमार जड़े, दीपिका तपस्वी और श्रेया शर्मा के साथ खुद जयश्री तांबे ने मंच साझा किया। इस प्रस्तुति में पारंपरिक घरानों का समावेश तो था ही, साथ ही अंग संचालन और लयकारी का गुण भी निहित था। जयश्री ने अपने गुरु का स्मरण करते हुए एकल प्रस्तुति भी दी। सुधीर फड़के और गदी माडगुलकर की जन्म शताब्दी वर्ष को देखते हुए जयश्री ने उनकी रचना पर कैकेयी-दशरथ संवाद प्रस्तुत किया। इसमें बताया गया कि कैकेयी भरत को राज्य और राम को वनवास देने की बात तो कहती है, लेकिन उनकी बात में जिद से ज्यादा आग्रह होता है, जिसे दशरथ ठुकरा नहीं पाते। भावों का सुंदर संयोजन इस प्रस्तुति में देखने को मिला।

आयोजन में गतभाव, तराना, तत्कार आदि को भी प्रस्तुत किया गया। गतभाव में निकास, रुखसार और गजेंद्र मोक्ष को पंखुड़ी शर्मा, साक्षी जोशी और रोचन सोनटक्के ने पेश किया तो पूजा पटवर्धन और कृति वैद्य ने तराना (गायन का विशेष प्रकार) के सौंदर्य को लयकारी के जरिए बताया। आभा निवसरकर ने गजल और गीत पर अभिनय अंग लिए कथक किया। आयोजन की अंतिम प्रस्तुति परमगुरु श्री कृष्ण को समर्पित थी। किशोरी आमोनकर की बंदिश 'म्हारो प्रणाम बांके बिहारी जी' पर सीनियर वर्ग की शिष्याओं ने प्रस्तुति दी। आयोजन में रिकॉर्ड म्यूजिक की बजाए लाइव संगीत पर प्रस्तुतियां हुईं। डॉ. तांबे के संगीत संयोजन में राहुल बेणे और मृणाल नागर ने तबला वादन, स्मिता वाजपेयी ने सितार और रचना पुराणिक ने हारमोनियम पर संगत की। पढ़ंत शुभांगी निरखीवाले ने की और संचालन माणिक भिसे ने किया।

फोटोः निलेश होलकर जी।