अनिल त्रिवेदी, इंदौर। National Youth Day 2020 युवा दिवस पर बात एक ऐसी युवा महिला की जिसने शहर को स्वच्छता में नंबर वन बनाए रखने की कोशिशों में शहर को कंपोस्टेबल बैग्स (थैलियां) व प्लास्टिक का विकल्प दिया। सेवा और बिजनेस के बीच संतुलन बनाती स्नेहलतागंज निवासी वैशाली पुराणिक की यात्रा... एमएससी करने के बाद मैं शिक्षिका बन गई थी। पति भी अच्छा कमाते थे। इसी बीच इंदौर स्वच्छता के मामले में देश का नंबर वन शहर चुना गया। दोबारा फिर नंबर वन बनाने की कोशिशें शुरू हुईं। प्लस्टिक-पॉलीथिन बैन हो गए, लेकिन विकल्प के अभाव में इसका इस्तेमाल हो रहा था, चालान भी बन रहे थे। ख्याल आया कि शहर को प्लास्टिक का कोई विकल्प देकर इंदौर को फिर से नंबर वन बनाने में अपना रोल अदा कर सकूं।

...लगा आसानी से स्वीकार कर लेंगे, लेकिन संघर्ष तो शुरू हुआ था : नौकरी छोड़कर काम पर फोकस किया। पति संदीप पुराणिक ने अहमदाबाद, दमन और मुंबई की कंपनियों में जाकर इन्हें बनाने की प्रक्रिया देखी। वहां से बैग्स लाकर दूध और किराने की दुकानों में वितरित किया। हमें लगा कि इन बैग्स को लोग आसानी से स्वीकार कर लेंगे, लेकिन संघर्ष तो अब शुरू हुआ था।

पहले तो दुकानदार ही नहीं मान रहे थे कि हमारे कंपोस्टेबल बैग्स, आम प्लास्टिक से अलग हैं क्योंकि सिर्फ देखकर इनमें फर्क कर पाना मुश्किल था। जो मान रहे थे, उनके भी चालान बन रहे थे। ऐसे में हमें नगर निगम अधिकारियों को यकीन दिलाने की भी मशक्कत करनी पड़ी कि मक्का के स्टार्च से बने कंपोस्टेबल बैग्स पर्यावरण की दृष्टि से कितने उपयोगी हैं। यहां तक कि इन पर प्रिंट भी कराना पड़ा कि 'मैं प्लास्टिक बैग नहीं हूं।' कंपोस्टेबल बैग्स की कीमत प्लास्टिक बैग्स के मुकाबले करीब तीन गुना ज्यादा थी इसलिए भी इसे लोग अपनाने से कतरा रहे थे।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्वीकृत : चाह थी तो राह भी मिली। पहले साल के मुकाबले दूसरे साल इन कंपोस्टेबल बैग्स की बिक्री बढ़ गई। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्वीकृति ने इस काम को आसान बना दिया। नियम मुताबिक 20 माइक्रोन तक के कंपोजटेबल बैग्स वैध हैं।

लागत कम करना लक्ष्य : अभियान तभी सफल होगा जब इसकी लागत घटेगी। पहला लक्ष्य है लागत घटाना। फिलहाल इस पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगता है। यदि कुछ कटौती हो तो लागत घट सकती है।

एक साल में इंदौर में बनने लगेंगे

दो साल पहले देश में मुंबई, दमन और अहमदाबाद में कंपोस्टेबल बैग बनाने वालों की संख्या सात थी जो अब 28 तक पहुंच गई है। इंदौर के एक उद्योगपति ने इसे यहीं बनाने की योजना तैयार कर ली है। प्लांट की लागत करीब आठ करोड़ रु. है। उम्मीद है कि एक साल के भीतर कंपोस्टेबल बैग्स इंदौर में भी बनने लगेंगे। स्थानीय उत्पादन से कीमत कम होने की संभावना है। गन्नों से बने डिस्पोजल को भी लोग पसंद कर रहे हैं।

Posted By: Prashant Pandey

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