इंदौर। बेटी (निर्भया) ने पढ़ाई पूरी की फिर फिजियोथैरेपी का कोर्स किया। कराते व योगा भी सीखा। उसके लिए हर काम संभव था। जब घटना हुई तब वह 23 साल की थी। इन सात सालों में हमें हर पल वही खून से लथपथ चेहरा, शरीर पर चोट, ऐसा लगा जैसे जानवरों के बीच से खींचकर लाई गई हो, यही यादें दिमाग में घूमती रहती हैं। जब किसी भी लड़की के साथ अनाचार की खबर सुनते हैं तो बेटी (निर्भया) का चेहरा याद आ जाता है। अब तो फांसी होनी चाहिए। यह कहना है निर्भया की मां का। वे शनिवार शाम इंदौर पहुंचीं। उन्होंने नईदुनिया से चर्चा में कहा कि अपराधियों को फांसी सुनाई जाती है लेकिन होती नहीं। निर्भया के गुनहगारों को फांसी होना चाहिए।

कानून में खामियां : वकील निर्भया का केस लड़ रही एडवोकेट सीमा कुशवाह ने कहा कि सात साल से जो देरी हुई वह कानून के लूप होल से हुई। दोषियों को सजा दिलाने के लिए लड़ रहे हैं। 1 फरवरी को फांसी की उम्मीद है।

हर रोज हमारे लिए चुनौती, फांसी की सजा सुना दी लेकिन होती नहीं

सात साल से संघर्ष कर रहे हैं। निर्भया के गुनहगारों को लोवर कोर्ट, हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में फांसी की सजा सुनाई। 2018 में कुछ माह इंतजार किया फिर हमने सुनवाई के लिए याचिका लगाई। एक साल तक दौड़ते रहे। कभी जज मिले तो कभी कोर्ट में छुट्टी आ जाती। अक्टूबर-नवंबर 2019 से सुनवाई शुरू हुई। गुनहगारों को नोटिस दिया गया लेकिन इन्होंने दया याचिका दायर नहीं की। फिर डेथ वारंट जारी होते ही ड्रामा चालू हो गया। यह बात शनिवार शाम को निर्भया की मां ने इंदौर में पत्रकारों से चर्चा के दौरान कही। उन्होंने बताया कि कभी हाई कोर्ट कभी सुप्रीम कोर्ट कभी पटियाला कोर्ट हाउस हर तीसरे दिन हम दौड़े। अब दया याचिका खारिज हो चुकी है लेकिन फिर से याचिका डाल दी। उसमें फांसी की सजा पर स्टे की मांग की गई है। हर रोज हमारे लिए एक नई चुनौती होती है। फांसी सुना दी गई लेकिन होती नहीं है।

अब मैं भी देखना चाहूंगी की कोर्ट इनको कितना अधिकार देता है। सात साल से कोई मानवाधिकार वाले मेरे पास नहीं आए। सात साल पहले एक बच्ची मर गई क्या उसका कोई अधिकार नहीं। एक माता पिता जिनकी बच्ची मर गई, उनका कोई अधिकार नहीं। जब केस लड़कर सजा तक पहुंचते हैं तो वे मानवाधिकार की बात कर माफी की मांग करती हैं। निर्भया की मां ने बताया सरकार ने अपील डाली है कि इस कानून में संशोधन हो। निर्भया के पिता ने कहा एक ही केस को तीन- तीन बार तीनों कोर्ट में सुना गया। फिर दोबारा जाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बार-बार चुनौती दी जा रही है।

Posted By: Prashant Pandey

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