इंदौर (अनिल त्रिवेदी)। नरेंद्र दामोदरदास मोदी आज दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। देश के मतदाताओं ने इस बार पहले से भी ज्यादा मतों से विजयी बनाकर उनके प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है। बच्चों को वोट देने का अधिकार नहीं है इसलिए चुनावों के दौरान उनसे जुड़े मुद्दों और दिक्कतों के बारे में बहुत खुलकर बात नहीं हुई। जबकि सोशल मीडिया दौर के ये बच्चे भी बहुत समझदार हैं। अधिकारों के साथ-साथ वो अपने कतर्व्यों के प्रति भी बड़ों की ही तरह जागरुक और सतर्क हैं। वो भी चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार पर और कड़ा प्रहार हो, देश की सीमाएं सुरक्षित हों, शिक्षा व्यवस्था में बदलाव हो, गरीब-अमीर के बीच की खाई खत्म हो और राजनीति को धर्म-जाति से परे रखा जाए। उनका कहना है कि लोगों ने आपको पिछली बार से अधिक वोटों से जिताया है। ऐसे में देश के हालात सुधारने के लिए सेकंड इनिंग में आप फर्स्ट इनिंग से भी ज्यादा बोल्ड स्टेप्स उठा सकते हैं।

हर भारतीय करे सेना की सेवा

हर भारतीय को कम से कम दो से पांच साल भारतीय सेना में सेवा अनिवार्य करें, तभी वो इतने मुश्किल हालात में सर्दी, गर्मी, बारिश की मार झेलते हुए भारतीय सैनिकों के महान परिश्रम और बलिदान का महत्व समझ पाएंगे। हमारे मन में हमारे सैनिकों के प्रति गहरा सम्मान होगा और फिर कोई भी उनके प्रति अनाश-शनाप बातें कहने की हिम्मत नहीं कर करेगा। यूं भी जिस देश में हम पीढ़ियों से रह रहे हैं, उसकी इतनी सेवा करने का फर्ज तो हमारा भी है। इससे हमारी भारतीयता और राष्ट्रीयता की भावना मजबूत होगी - पार्थ जैन, 14 साल

भारी बस्तों से मिले आजादी

यूं तो हमारे देश को आजादी 72 साल पहले मिल गई थी लेकिन हम बच्चों को भारी-भरकम बस्तों से अब तक आजादी नहीं मिल पाई है। लोग कहते हैं कि इस बारे में कई बार नीति भी बनी लेकिन सख्ती से इसका पालन नहीं किया गया। वजनी बस्ते की वजह से हमारा बचपन खराब हो रहा है, रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो रही है लेकिन समस्या जस की तस है। ऐसे में हम आपसे पूरी शिक्षा व्यवस्था में आधुनिक तकनीकी संसाधनों से आमूलचूल बदलाव की उम्मीद करते हैं, जिसमें ऑनलाइन एजुकेशन को पर्याप्त महत्व दिया जाए - अत्रि गेहलोत, 14 साल

इंदौरियंस की मिसाल दें

पांच साल पहले जब आपने लाल किले से स्वच्छता का आह्वान किया था तब शायद हम इंदौरियंस ने भी नहीं सोचा था कि हम लगातार तीन बार देश के सबसे साफ शहर का खिताब जीतकर हैट्रिक बनाने में कामयाब हो जाएंगे। लेकिन हम इंदौरियंस की यही खूबी है कि हम जो भी काम करते हैं पूरी ताकत झोंक देते हैं। हमारी इसी लगन, समर्पण और मेहनत के दम पर हम तीन बार सरताज बन चुके हैं और उम्मीद है कि ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। मेरी रिक्वेस्ट है कि आप दूसरे शहरों के लोगों को भी इंदौरी जज्बे के बारे में बताएं और उन्हें भी अपने शहर को साफ-सुथरा बनाने के लिए प्रोत्साहित करें - शुभागता शर्मा, 14 साल

पापुलेशन कंट्रोल कर सुधारें ट्रैफिक

हम इंदौरियंस सफाई में बेशक नंबर वन बन गए हैं लेकिन हमारे शहर का ट्रैफिक बहुत बेतरतीब है। हालांकि बीच-बीच में इसे सुधारने की कोशिशें होती रहती हैं लेकिन देश के हर हिस्से के लोग इस शहर में लगातार आ रहे हैं, जिससे पापुलेशन बढ़ रही है और ट्रैफिक अस्त-व्यस्त हो रहा है। जनसंख्या विस्फोट, बेतरतीब ट्रैफिक के साथ-साथ क्राइम, कब्जा, अतिक्रमण जैसी और भी कई गंभीर समस्याओं की वजह भी बन रहा है। इसलिए इस समस्या के निपटने के उपाय पूरी सख्ती से लागू करने की जरूरत है- रिजुल शुक्ला, 16 साल

आधार कार्ड बने हमारी पहचान

दो नाम एक जैसे हो सकते हैं लेकिन दो आधार कार्ड नंबर एक जैसे नहीं हो सकते। इसलिए अच्छा हो कि नाम के बजाय लोगों की पहचान उनके आधार कार्ड के नंबर से हो। आधार कार्ड में बेशक नाम और उपनाम भी रहें लेकिन प्रमुखता आधार नंबर को मिले। नंबर के पहले भारतीय या इंडियन भी जोड़ दिया जाए। हर सरकारी काम में भी व्यक्ति की पहचान इसी नंबर से हो। इसका सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि धीरे-धीरे जाति-धर्म गौण होता जाएगा और हममें खुद को सबसे पहले भारतीय मानने की प्रवृत्ति विकसित होगी - वैदेही व्यास, 13 साल

उठाएं, नोटबंदी जैसे कड़े कदम

आपने पिछले कार्यकाल में नोटबंदी जैसा कड़ा कदम उठाया था। मेरे पापा कहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और संतुलित विकास के लिए वो कदम उठाना जरूरी था। इसकी कामयाबी इसी बात से साबित होती है कि नोटबंदी के कई महीनों बाद तक लोग अपना कालाधन नालियों, कचरे के डब्बों और तालाबों में फेंकते रहे। ये वही ब्लैक मनी थी जो उन्होंने दूसरों का हक मारकर जमा की थी। इस बार भी आप इस तरह के कठोर आर्थिक कदम जरूर उठाएं ताकि भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति पर लगाम लग सके- आयुष भट्ट, 13 साल

बंद हो नशीले पदार्थों का कारोबार

हमारी सरकार नशीले पदार्थों का इस्तेमाल न करने के विज्ञापनों पर हर साल करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करती है। दूसरी ओर टैक्स कमाने के नाम पर गुटका, बीड़ी, तमाखू, शराब समेत कई तरह के नशीली वस्तुओं का उत्पादन भी जारी रखने की इजाजत भी देती है। ये दोहरी नीति सही नहीं है। अगर हमें पता है कि नशीले पदार्थों के सेवन से हमारे देश के नागरियों और खासतौर पर युवाओं को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुंचा रही है तो इस पर पूरी कड़ाई से पाबंदी लगानी चाहिए - एलिना कुरैशी, 15 साल

ऑनलाइन अवेलेबल हों फाइल्स

आपके पहले कार्यकाल में हुई कोशिशों से रिश्वतखोरी पर आंशिक अंकुश तो लगा है लेकिन ये समस्या अब भी बहुत गंभीर बनी हुई है। छोटे से छोटे काम के लिए भी बाबू, अफसर से लेकर चपरासी तक रिश्वत मांगने से गुरेज नहीं करते हैं। खासतौर पर जब किसी ईमानदार शख्स को अपनी गाढ़ी कमाई इन रिश्वतखोरों को देनी पड़ती है तो उसका व्यवस्था से विश्वास उठ जाता है। इसलिए मेरा निवेदन है कि ज्यादा से ज्यादा लेन-देन ऑनलाइन करें और कुछ ऐसी व्यवस्था करें कि सारी सरकारी फाइलों की स्थिति और काम होने की संभावित डेट लोगों को इंटरनेट पर ही अवेलेबल हो जाए- भाविनी अग्रवाल, 15 साल

Posted By: Rahul Vavikar