इंदौर। सामाजिक बदलाव के ये चंद उदाहरण हैं, लेकिन अब यह एक-दो परिवारों तक सीमित नहीं होकर पूरे समाज में तेजी से बढ़ता जा रहा है। कई संवेदनशील परिवार सिर्फ अपने शौक पर पैसा खर्च करने के बजाय गरीब मरीजों की जिंदगी बचाने के लिए पैसा दान कर रहे हैं। अपने हिस्से की खुशियां जरूरतमंदों पर लुटा रहे हैं।

चाहे जन्मदिन हो, घर में शादी हो, शादी की सालगिरह हो या कोई भी खुशी का मौका हो, लोग परिवार सहित एमवाय अस्पताल पहुंचकर पार्टी या आयोजन पर होने वाले खर्च की राशि दान कर रहे हैं। इससे गरीब मरीजों के लिए दवाइयां, इंजक्शन, फल सहित कई जरूरत की वस्तुएं खरीदी जा रही हैं। बीते कुछ सालों में दान राशि में करीब 25 फीसदी बढ़ोतरी हो गई। इसमें गोपनीय दान करने वाले लोगों के साथ अपनी 'खुशियों का पैसा' दान करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है

समाज हो रहा संवेदनशील

अस्पताल में सेवा कार्य करने वाली संस्था परपीड़ाहर सोसायटी के राधेश्याम साबू कहते हैं कि आजकल समाज गरीब लोगों के लिए काफी संवेदनशील हो रहा है। लोग हमें शादी समारोह में, जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ के पहले ही संपर्क कर लेते है कि वे पार्टी आयोजित नहीं कर पैसा मरीजों के लिए देना चाहते हैं। परिजन की मृत्यु होने पर तीसरे और तेरहवीं में दिवंगत के नाम से राशि दान कर रहे हैं। पूजा-पाठ में चढ़ावे की राशि तक हमारे पास आने लगी है।

ड्रेसिंग के लिए ऊपर चक्कर नहीं काटेंगे मरीज

एमवाय अस्पताल की दूसरी मंजिल पर जनसहयोग से मरीजों के लिए एक केबिन तैयार किया गया है जहां मरीजों की ड्रेसिंग व टांके कांटे जा सकेंगे। अब तक मरीजों को इसके लिए नीचे कई चक्कर काटने पड़ते थे। कभी ट्राली या स्ट्रेचर नहीं मिलता तो कभी लिफ्ट के लिए इंतजार करना पड़ता। जनसहयोग से ही उपकरणों के पांच सेट भी भेंट किए गए हैं।

बेटी के बर्थडे पार्टी पर खर्च करने के बजाए की मदद

शर्मा दंपती की दो साल की बेटी खुशी का जन्मदिन था। दंपती ने पार्टी पर खर्च करने के बजाय 20 हजार रु. की दवाइयां गरीब मरीजों के लिए दान कर दीं। बेटी के हाथों से अस्पताल में भर्ती बच्चों को गुब्बारे, फल और खिलौने बंटवाए तो मासूमों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

आरती के पैसे से मरीजों की मदद

सिंगापुर टाउनशिप में हर साल सोसायटी के सभी परिवार गणेश स्थापना करते हैं। यहां सुबह की आरती का पैसा पंडितजी को और शाम की आरती में चढ़ने वाली दान राशि इकट्ठा कर अस्पताल में पहुंचा दी जाती है। यहां गरीब मरीज भगवान के पैसों से फल व दवाइयां लेते हैं।

माहेश्वरी परिवार में हाल ही में गमी हुई। परिवार में मृत्युभोज नहीं करने पर सहमति बनी। सिर्फ तेरहवीं का कर्मकांड के साथ पांच पंडितों को भोजन करवाया और 50 हजार रुपए अस्पताल के मरीजों की मदद के लिए दान कर दिए गए।

मृत्युभोज की परंपरा हुई कम साबू के मुताबिक कई समाजों में मृत्युभोज की परंपरा कम होती जा रही है। मृत्युभोज पर हजारों रुपए खर्च होते हैं। संवेदनशील लोग इस पैसे का सही उपयोग गरीब मरीजों के लिए कर रहे हैं। दिवंगतों की स्मृति में किए जाने वाले दान की राशि में बढ़ोतरी हो रही है।