इंदौर, नईदुनिया रिपोर्टर। अगर आपकी इच्छा शक्ति मजबूत है तो आप जिंदगी में कोई भी मुकाम हासिल कर सकते हैं। पूरे जज्बे के साथ की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। अपने सपने बुनिए और जुनून के साथ उन्हें पूरा करने में लग जाइए।

यह बात अपने मजबूत हौसलों से करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनीं पद्मश्री दीपा मलिक ने कही। वे शनिवार को फिक्की फ्लो के कार्यक्रम में हिस्सा लेने शहर आई थीं। उन्होंने 2016 में आयोजित रियो पैरालिंपिक में शॉटपुट में सिल्वर मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया है। इसके अलावा दीपा ने 4.61मीटर तक गोला फेंका और दूसरे स्थान पर रहीं। वे देश की पहली महिला खिलाड़ी हैं, जिन्होंने पैरालिंपिक में भारत के लिए मेडल जीता है। अर्जुन अवार्ड विजेता दीपा ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 58 जीते हैं। इसके अलावा वे इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में भी 18 मेडल जीत चुकी हैं।

चेहरे पर हमेशा मुस्कराहट

दीपा ने अपनी दिव्यांगता को कभी अपनी सफलता के आड़े नहीं आने दिया। हमेशा मुस्कराने वाले दीपा कहती हैं जिंदगी अच्छे से चल रही थी। मेरी दो बेटियों ने जीवन में खुशियां और बढ़ा दी थी। इस बीच 29 साल की उम्र में मुझे स्पाइनल कॉर्ड में ट्यूमर के बारे में पता चला और मेरी कमर के नीचे के हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। घर के अंदर हर समय व्हील चेयर पर बैठे रहना मुझे मंजूर नहीं था। कुछ दिन बाद सोचा सिर्फ व्हील चेयर पर बैठकर जीवन नहीं बिताना है, बल्कि शरीर से ही काम करना है। मैंने एक्सरसाइज और स्वीमिंग शुरू की।

इसके बाद जब मुझे महाराष्ट्र पैरालिंपिकएसोसिएशन से नेशनल प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए कहा गया, उस समय मेरी उम्र 36 साल थी। मैं हमेशा कुछ अलग करने में विश्वास करती हूं, इसलिए मैंने इसमें शामिल होने का निर्णय लिया। फिर खेल से ऐसा नाता जुड़ा कि जो अब तक अटूट है। मैं फिलहाल एशियन गेम्स की तैयारी कर रही हूं। मुझे खुशी है कि आज मुझे व्हील चेयर की पेशेंट की जगह लोग एक खिलाड़ी के रूप में जानते हैं। शायद मैं अपंगता की वजह से ही जीवन पर फोकस कर पाई।

मेरा सिद्धांत है जो भी काम करो अव्वल दर्जे का करो। भले ही मामला कार ड्राइव का हो या स्वीमिंग का या फिर शॉट पुट, जैवलीन का। इन सभी में मेडल जीते। खेलों में सुधार और दिव्यांग खिलाड़ियों को भी सामान्य खिलाड़ियों के बराबर अधिकार दिलाने का दीपा हर दम प्रयास करती हैं। वो इन खिलाड़ियों के केश इनाम, स्कॉलरशिप, जॉब्स के लिए संघर्ष में जुटी है। वे कहती हैं हम खिलाड़ी हैं हमें चैरिटी नहीं चाहिए, हमें सिर्फ फंडिंग, स्कॉलरशिप चाहिए।

परिवर्तन की जगह खुद शुरुआत करें

दीपा का मानना है दूसरे आपको उसी तरह देखते हैं, जैसे आप खुद स्वयं को देखते हैं। इसलिए कभी अपने को कमजोर नहीं मानें। जीवन एक बार मिला है उसे अच्छे से जिएं। हममें से अधिकांश सरकार या मददगार का इंतजार करते रहते हैं, क्यों नहीं आप खुद ही शुरुआत करें। अगर हर व्यक्ति कुछ सहयोग करे तो बड़े परिवर्तन अपने आप ही होंगे। दीपा पहली दिव्यांग महिला खिलाड़ी हैं, जिन्हें फेडरेशन ऑफ इंडिया मोटर स्पोर्ट्स क्लब ने आधिकारिक रूप से लाइसेंस दिया है।

स्पोर्ट्स हो रिहेबिलिटेशन कार्यक्रमों का हिस्सा

वे कहती हैं विदेशों में स्पाइनल कॉर्ड की बीमारी से पीड़ित लोगों के रिहेबिलिटेशन का महत्वपूर्ण भाग होता है स्पोर्ट्स। हमारे यहां इसको लेकर यह सोच विकसित नहीं हो पाई है। सच तो यह है कि स्पोर्ट्स को जरूरी बनाने से न सिर्फ व्यक्ति फिट रहेगा, बल्कि बाहरी दुनिया से जुड़ेगा और आत्मविश्वास बढ़ेगा। इसके लिए हॉलिस्टिक एप्रोच के साथ रिहेबिलिटेशन सेंटर बनाए जाना चाहिए।

जरूरी है काम और घर में बैलेंस बनाना

लिबरलाइजेशन का मतलब सिर्फ दूसरे जेंडर के साथ बराबरी करना ही नहीं है, बल्कि घर और काम, पैशन और हॉबी में परफेक्ट बैलेंस बनाना है। आपको प्रॉपर टाइम मैनेजमेंट आना चाहिए हमेशा चीजों को एडवांस में करें।

उपलब्धियों से भरा सफर

-2008 में यमुना नदी का 1 किमी का स्ट्रेच पार किया।

-2013 में चेन्नई से दिल्ली तक की सबसे लंबी 3,278 किमी की ड्राइव सफलतापूर्वक पूरी की।

-पहली महिला जिसने 2009 में खारदुंगा लापास तक ड्राइव की।

-2014 में एशियन पैरा गेम्स में जैवलीन में सिल्वर मेडल।

-2012 में फर्स्ट मलेशियन ओपन एथलीट चैंपियनशिप में 2 गोल्ड जीते

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