इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि, Religious Indore News। हमारे जीवन में आध्यात्म की प्रवृत्ति तभी पैदा होगी, जब हम एक अद्वितीय परम सत्ता के प्रति समर्पण का भाव रखेंगे। जब तक अपने अंदर के अहंकार का विसर्जन नहीं होगा, तब तक हमें न तो अध्यात्म का आश्रय मिलेगा और न ही हम किसी अन्य क्षेत्र में कामयाब होंगे। अहंकार हमारे ज्ञान मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। अहंकार गले बिना अमृत रूपी ज्ञान नहीं मिल पाएगा।

यह बात संत सुधांशु महाराज ने विश्व जागृति मिशन इंदौर मंडल के तत्वावधान में चल रहे सात दिवसीय आनलाइन भक्ति सत्संग में कही। उन्होंने कहा कि भगवान हमें शांति और नींद मुफ्त में देते हैं लेकिन हमने आसपास ऐसा माहौल बना रखा है कि बिना दवाई-गोली लिए न तो शांति मिलती है, न ही नींद। शिष्य वही हो सकता है, जिसे बड़ी प्यास हो। उसे गुरू के आभामंडल में शामिल होना चाहिए। ज्ञान की प्राप्ति मर्यादापूर्ण आचरण से ही संभव है।

गुरू के सामने अहंकार का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। पितरों और गुरू की कृपा जितनी भी मिले, उसे अपना सौभाग्य मानकर चलें। यह पितृ पक्ष चल रहा है इसमें हम अपने पितरों की स्मृति में एक-एक पौधा भी लगा सकें तो बड़ा काम होगा। यही पौधे आगे चलकर ऑक्सीजन सिलेंडर का काम करेंगे। जब पशु-पक्षी भी प्रतिदिन हजारों-लाखों पौधे लगा सकते हैं तो हम क्यों नहीं। भारतीय समाज कृतज्ञता की परंपरा का पक्षधर है। जिन्होंने अपनी सांस में से हमें सांस दी है, ऐसे अपने पितरों के लिए अवश्य कृतज्ञता व्यक्त करें। आचार्यश्री के पूर्व डा आर्ची दीदी ने भी प्रवचन दिए।

Posted By: gajendra.nagar

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