अनिल त्रिवेदी, इंदौर। 65 साल की उम्र में शूटिंग सीखकर दो दशकों में स्टेट और प्री-नेशनल लेवल पर कई मेडल जीत चुकी शूटर दादी चंद्रो तोमर की अनूठी कहानी हजारों-लाखों लोगों को परिस्थितियों से घबराए बिना, हर हाल में हालात का मुकाबला करने का हौसला दे रही है। शनिवार को बास्केटबॉल कॉम्पलेक्स में सुबह 11 बजे होने वाले अखिल भारतीय श्वेतांबर जैन महिला संघ के कार्यक्रम में हिस्सा लेने अपनी पोती शेफाली के साथ शहर आई शूटर दादी की यही प्रेरणास्पद कहानी उनके पोते दामाद सुमित राठी ने नईदुनिया से साझा की। वो बताते हैं कि दादी मुझे पोतों से भी बढ़कर 'सवा पोता" कहती हैं और मेरी निगाह में भी उनका दर्जा बहुत ऊंचा है।

'हिम्मत करे इंसान तो सहायता करे भगवान"

बकौल सुमित... दादी की सबसे बड़ी खूबी ये है कि वो 88 साल की उम्र में भी खुद को बूढ़ा नहीं मानती हैं। कहती हैं उम्र के हिसाब से तन बुड्ढा हो जाता है, लेकिन मन बूढ़ा नहीं होता। इसलिए अगर आप ये सोचकर हिम्मत हार बैठे हैं कि अब आपकी उम्र हो गई है तो फिर से उठ खड़े होइए। 'हारिए न हिम्मत बिसारिए न राम" ... ऊपरवाले को याद कीजिए और जो भी अच्छा कर सकते हैं कीजिए। ऊपरवाला उनकी मदद पहले करता है जो अपनी ओर से हरसंभव प्रयास करते हैं। उनकी जिंदगी की फिलासफी है कि 'हिम्मत करे इंसान तो सहायता करे भगवान"।

पोती को शूटिंग सिखाने गई दादी खुद सीख गई

दादी की दूसरी खूबी ये है कि वो हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए किसी भी हद तक प्रयास करने को तैयार रहती हैं। यहां तक कि शूटिंग सीखने भी वो खुद नहीं गई थीं। 1997 में उनकी नौ साल की पोती शेफाली शूटिंग सीखना चाहती थी लेकिन घरवालों ने मना कर दिया था। तब उस वक्त 65 साल की दादी ने कहा कि अगर वो शूटिंग सीखना चाहती है तो सीखेगी। भले ही उसके साथ मुझे खुद रोजाना वहां आना-जाना पड़े। इस तरह पोती शूटिंग सीखने लगी। एक बार उन्होंने शूटिंग में यूं ही हाथ आजमाया तो पहला ही निशाना बिलकुल सटीक लगा। लोगों ने कहा 'तीर में तुक्का" लग गया दादी। फिर से निशाना लगाकर दिखाओ तो माने। दादी ने चैलेंज कबूल किया और दोबारा फिर कमोबेश वही रिजल्ट रहा। इसके बाद तो जो लोग तंज कर रहे थे वही कहने लगे कि दादी तुम कोशिश करो तो इस फील्ड में बहुत आगे जा सकती हो। इस तरह शुरू हुआ निशानेबाजी का सिलसिला अब तक जारी है।

कामयाबी की बुलंदियों पर जमीन से जुड़ी दादी

धीरे-धीरे दादी और पोती (शेफाली) दोनों इतनी एक्सपर्ट शूटर हो गईं कि कई दफा तो एक ही इवेंट में अपनी-अपनी केटेगरी में दादी और पोती ने साथ-साथ भी मेडल जीते। मगर जब नाम मिलने लगा तो विरोध भी तेज हो गया। खास बात ये कि विरोध के स्वर सबसे पहले घर से ही उठे। लेकिन दादी अपने संकल्प पर कायम रहीं। पोती को भी आगे बढ़ाया और खुद भी आगे बढ़ीं। बाद में जब इज्जत-शोहरत बढ़ने लगी तो विरोध के स्वर मंद पड़ गए। स्थिति ये भी आई कि विरोध करने वालों ने वाहवाही शुरू कर दी।

दादी स्टेट, जोनल और प्री-नेशनल लेवल पर शूटिंग में कई मेडल जीत चुकी हैं। उनकी जिंदगी पर आधारित फिल्म 'सांड की आंख" बनी है और खूब सराही भी गई है। लेकिन कामयाबी की बुलंदियां छूने के बावजूद दादी अब भी पूरी तरह जमीन से जुड़ी हुई हैं और पहले की ही तरह उनके व्यवहार की सादगी कायम है। आज वो लाखों-करोड़ों महिलाओं की आदर्श हैं लेकिन सहजता इतनी है कि आपके पास से गुजर जाएं और ये एहसास भी न होने दें कि उन्होंने कितनी खूबी से हर खास-ओ-आम को जिंदगी को नया आयाम देने की कला सिखाई है।

Posted By: Hemant Upadhyay

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