Special on Janmashtami : हर्षल सिंह राठौड़। इंदौर (नईदुनिया)। यूं तो भगवान श्रीकृष्ण को मुरलीधर कहा जाता है और उनके बड़े भाई बलराम को हलधर, लेकिन इंदौर में एक मंदिर ऐसा भी है, जहां वेणु बजाते केवल श्रीकृष्ण ही नहीं हैं, बल्कि बलदाऊ भी हैं। श्रीकृष्ण के साथ राधारानी है तो बलदाऊ के साथ उनकी पत्नी रेवती हैं। रेवती के बाएं हाथ में कमल का पुष्प और दाहिने हाथ में पान का बीड़ा है। शहर में इस दुर्लभ छवि के दर्शन श्रीमदनमोहनजी के मंदिर में होते हैं।

शहर की पुरानी बसाहट के बीच आस्था के केंद्र बने इस मंदिर का इतिहास 181 साल पुराना जरूर है, लेकिन इसके बारे में आज की पीढ़ी के बहुत कम लोगों को जानकारी है। निजी हाथों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सेवा होने के कारण इस मंदिर में बाहरी व्यक्ति की दखलअंदाजी नहीं है। भोग से लेकर भगवान की पोषाक, पुष्पहार आदि बनाने तक का काम परिवार के वे ही लोग तैयार करते हैं, जिन्हें मंदिर की मुखिया ज्ञानवती ने जिम्मेदारी सौंप रखी है। बाहर से लाया गया कुछ भी खाद्य पदार्थ यहां भोग के रूप में नहीं चढ़ाया जाता।

बांसुरी बजाते हुए देख रहे श्रीकृष्ण की ओर

पुष्टिमार्गीय संप्रदाय के इस मंदिर में श्रीकृष्ण और राधारानी की मूर्ति के पास ही बलराम व रेवती की मूर्ति भी स्थापित है। बलराम की मूर्ति इस तरह से रखी गई है, जिसमें वे श्रीकृष्ण की ओर देख रहे हैं। अमूमन बलराम के सिर पर शेषनाग अंकित होता है, लेकिन यहां स्थापित उनकी मूर्ति में शेषनाग बलराम के पैरों में है।

यही नहीं, श्रीकृष्ण की बांसुरी दाहिनी ओर है और बलराम की बांसुरी बायीं तरफ है, क्योंकि माना जाता है कि बलराम बाएं हाथ से कार्य करते थे। रेवती की तरह ही राधारानी के एक हाथ में कमल और दूसरे हाथ में पान का बीड़ा है। मान्यता है कि राधा और रेवती यहां अपने-अपने स्वामी की दासी नहीं, बल्कि सखी बनकर विराजी हुई हैं, इसलिए वे उन्हें पान का बीड़ा दे रही हैं। यह मूर्तियां अष्टधातु की बनी हैं, इसलिए इन्हें गौरवर्णीय मूर्तियों में शामिल किया गया है।

इसलिए है बलराम के हाथों में बांसुरी

मंदिर के छोटे मुखिया अनुराग शर्मा बताते हैं कि श्रीमद्भागवत के दशम स्कंद में बलराम के इस स्वरूप का वर्णन आता है। श्रीकृष्ण जब गोकुल छोड़कर चले जाते हैं तो एक दिन वे बड़े भाई बलराम से कहते हैं कि वे उनकी तरह तैयार होकर नंदबाबा-यशोदा और गोपियों से मिलने जाएं और उनके हाल जानें। बलराम जब गोकुल पहुंचते हैं तो गोपियां भावविभोर हों उन्हें पहचान नहीं पातीं और उन्हें रास करने के लिए कहती हैं। चैत्र माह की पूर्णिमा पर गोपियों और बलराम के रास का उल्लेख है। बाद में जब राधारानी वहां पहुंचती है तो बलराम को पहचान जाती हैं।

14 स्थानों पर ही है यह दुर्लभ मूर्ति

मंदिर के बड़े मुखिया आलोक शर्मा बताते हैं कि मंदिर की स्थापना 181 वर्ष पहले चुन्नाीलाल मुखिया ने की थी। पहले यह मंदिर सराफा में था। तब केवल राधा-कृष्ण की ही मूर्तियां थीं। परदादा स्व. जगन्नााथ मुखिया को यह महसूस हुआ कि पुष्टिमार्गीय संप्रदाय में श्रीकृष्ण के साथ बलराम की सेवा का भी विधान है तो उन्होंने काशी में अपने गुरु गोस्वामी 108 मुरलीधरलाल से यह बात कही।

तब गुरु ने अपने पास से बलराम व रेवती की यह मूर्ति उन्हें दी और 17 जुलाई 1932 से श्रीकृष्ण के साथ उनके भाई-भाभी की सेवा भी यहां होने लगी। बलराम की यह मूर्ति देश में सिर्फ 14 स्थानों पर ही है, जिसमें से एक यह इंदौर में है।

मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अलावा नंदोत्सव, गोपाष्टमी, दीपावली, दशहरा, वल्लभाचार्य जयंती, देवउठनी एकादशी पर तो विशेष उत्सव होते ही हैं, रक्षाबंधन के एक दिन पहले चतुर्दशी को श्रीबलराम जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। इस दिन बलरामजी को बेसन के लड्डू, खीर, बासुंदी और भांग का विशेष भोग लगाया जाता है।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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