World Handicapped Day Indore, इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। बचपन से खिलाड़ी बनकर देश का नाम रोशन करने का जज्बा लिए दो युवा दिनरात मेहतन में जुटे रहे। कड़ी मेहनत और समर्पण के बीच अपने सपने पूरे करने बहुत ही करीब पहुंच गए, लेकिन नियती ने इनके कदम थाम दिए...। इस पल ने दोनों की जिंदगी बदल कर रख दी। आम तौर पर हालातों से मायूस होकर हिम्मत हार जाते हैं, लेकिन इन्होंने जिंदादिली की मिसाल पेश की। परिवार ने दोनों युवाओं का साथ दिया और उनका मनोबल बढ़ाया। इसी का नतीजा है कि आज दोनों युवा शेहजाद अली व रवीश उमठ मप्र की इंदौर की व्हीलचेयर क्रिकेट टीम के सदस्य के रूप में प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। पेश है दोनों खिलाड़ियों की प्रेरणादायक कहानियां...

बचपन से दोनों पैर खराब थे, शेहजाद ने दिव्यांग खिलाड़ियों की बना दी टीम

मप्र व्हीलचेयर क्रिकेट टीम के सदस्य शेहजाद अली 29 साल के हैं। शेहजाद की कप्तानी में ही इंदौर टीम ने यह टूर्नामेंट जीता। एक कॉल सेंटर में नौकरी करने वाले शेहजाद ने बताया कि बचपन से ही दोनों पैर खराब हैं। हड्डी बहुत ज्यादा कमजोर थीं और बार-बार टूटती रहती थीं। बचपन में बोल भी नहीं पाता था। हीन भावना महसूस करता था। खेल का शौक था। वर्ष 2016 में व्हीलचेयर क्रिकेट के बारे में जानकारी मिली।

फिर इंटरनेट मीडिया के जरिए लोगों से संपर्क किया। भोपाल में मप्र टीम के लिए हुए हमारा ट्रायल में हिस्सा लिया और चयनित भी हुआ। फिर अलग-अलग जगह खेलने गए। इसके बाद मैंने तय किया कि इंदौर में भी टीम बनाना है। उन्होंने कहा- शुरू में हमें खेलने के लिए मैदान नहीं मिलता था। प्रशासन के सहयोग से हमें आइटीआइ मैदान में अभ्यास की अनुमति मिली है। यहां हर रविवार को 15 से 20 दिव्यांग खिलाड़ी अभ्यास करते हैं और मैच खेलते हैं। इस आयोजन में भी शेहजाद की अहम भूमिका है।

कभी फर्राटा धावक थे रवीश, दुर्घटना में पैर कटा... अब क्रिकेट ने बदली जिंदगी

कभी फर्राटा धावक रहे रवीश उमठ की जिंदगी एक दुर्घटना ने बदल दी। 32 साल के रवीश उमठ राष्ट्रीय स्तर के एथलीट थे। 100 मीटर फर्राटा दौड़ और ऊंची कूद, तिहरी कूद, गोला फेंक के खिलाड़ी थे। ऊंची कूद और तिहरी कूद में मप्र का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्ट्रीय स्पर्धा में हिस्सा ले चुके हैं। 2017 में सड़क दुर्घटना में एक पैर काटना पड़ा। मगर खेल ने फिर उन्हें जीवन की राह दिखाई। इंदौर की व्हीलचेयर क्रिकेट टीम का हिस्सा रवीश बताते हंै, जब पैर कटा तो मैं अवसाद में घिर गया था। मगर माता-पिता ने संभाला। पिछले साल एक दुर्घटना में उनका भी निधन हो गया। इसके बाद व्हीलचेयर क्रिकेट खेलने वाले समूह से जुड़ा। खेल ने मुझे हिम्मत दी और हताशा से निकला। एक निजी कंपनी में नौकरी करता हूं और अन्य लोगों को जीवन की छोटी-छोटी परेशानियों से हार न मानने के लिए प्रेरित करता हूं।

Posted By: sameer.deshpande@naidunia.com

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