Indore Ka Man: मनोहर देव, इंदौर। व्यापार और उद्योग के मामले में इंदौर ने देशभर में अपनी छाप छोड़ी है। प्रदेश में सबसे अग्रणी शहर भी है। इंदौर जैसा कोई शहर नहीं है। फिर भी हमें भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर इंदौर का दूरगामी विकास माडल तैयार करना होगा। विकास का ऐसा माडल जो आने वाले सौ साल की जरूरतों को न केवल पूरा कर सके, बल्कि देश के नक्शे पर इंदौर को अग्रणी भी बना सके। मेरा मानना है कि इंदौर को मेट्रोपोलिटन सिटी घोषित करा लेने भर से कुछ नहीं होगा। हमें और बड़ा सोचना चाहिए। इंदौर को मध्य भारत का हब मानकर और इसमें आसपास के उज्जैन, देवास, धार और महू को जोड़कर रीजनल डेवलपमेंट अथारिटी का गठन किया जाए।

यह अथारिटी भविष्य का ऐसा मास्टर प्लान बनाए जो आने वाले सौ साल तक काम आए। इसमें मेट्रोपोलिटन सिटी के बजाय मेट्रोपोलिटन रीजन का खाका प्रस्तुत किया जाए। पूरे क्षेत्र में बढ़ती आबादी और विस्तार को देखते हुए ढांचागत सुविधाओं जैसे सड़क, रेलवे, परिवहन, बिजली, पानी आदि की व्यवस्थाएं जुटाई जाएं। आबादी के हिसाब से ही रोजगार के साधन और उद्योग-धंधों की योजना बनाई जाए। अन्यथा इंदौर नगर निगम में सौ-पचास गांव शामिल करते जाएंगे और वैसे ही देवास और धार तक पहुंच जाएंगे। पर हम एक सुनियोजित विकास नहीं दे पाएंगे।

मेरा जन्म तो पाकिस्तान के जैकबाबाद में हुआ, लेकिन जब मैं छह महीने का था तब 1946 में माता-पिता इंदौर आ गए थे। मेरी पूरी पढ़ाई इंदौर में हुई। उस समय वैष्णव स्कूल में चक्रवर्ती सर प्राचार्य थे। वे धोती-कुर्ता पहना करते थे। बाजार में भरी भीड़ में भी मिल जाते थे तो हम सब साथी उनके पैर छूना नहीं भूलते थे। वर्ष 1962 में एसजीएसआइटीएस से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एडमिशन लिया। उस समय तक मध्यप्रदेश में एक भी विश्वविद्यालय नहीं था। इसीलिए पहले साल मुझे आगरा विश्वविद्यालय का प्रमाण-पत्र मिला।

बाद में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन और फिर इंदौर विश्वविद्यालय बना। मेरे मन-मस्तिष्क पर छात्र जीवन की स्मृतियां अब भी ताजा हैं। हमारी बैच के साथी बहुत प्रतिभावान थे। इनमें दीपक फाटक और सुशील दोशी तो पद्मश्री भी हुए। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह, अशोक सोजतिया, विनोद गोठी, महेशप्रतापसिंह भी हमारी बैच के साथी रहे।

मेरे मन की याद गली

मेरा जन्म अविभक्त भारत के जैकबाबाद (पाकिस्तान) में हुआ। मेरे जन्म प्रमाण-पत्र पर यही लिखा हुआ है। जब पहली बार पासपोर्ट बनवाया तो भोपाल में इसका कार्यालय नहीं था। लखनऊ गया तो पासपोर्ट अधिकारियों ने मेरा जन्म प्रमाण-पत्र देखकर पासपोर्ट बनाने से इन्कार कर दिया। उनके साथ काफी देर मेरी बहस हुई। मैंने उन्हें बताया कि मेरा जन्म तो भारत में ही हुआ। देश आजाद होने के बाद जैकबाबाद पाकिस्तान में चला गया तो इसमें मेरी क्या गलती। समझाने के बाद वे पासपोर्ट बनाने को तैयार हुए और पासपोर्ट में लिखा प्लेस आफ बर्थ जैकबाबाद अनडिवाडेड इंडिया। इसके बाद चार-पांच बार मेरे पासपोर्ट का नवीनीकरण हो चुका है और आज भी उसमें वही लिखा हुआ है।

(लेखक एसोसिएशन आफ इंडस्ट्रीज मध्यप्रदेश (एआइएमपी) के पूर्व अध्यक्ष और स्टेट बैंक आफ इंदौर के पूर्व बोर्ड आफ डायरेक्टर हैं।)

Posted By: Sameer Deshpande

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